पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१९८

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गौतम-"श्राद्ध से ओघ पार कर सकते हैं, अंप्रमाद से अर्णव उतर सकते हैं, वीर्य से दुःख का नाश हो सकता है और प्रज्ञा से परिशुद्धि पाप्त होती है।" यन-"प्रज्ञा किससे प्राप्त होती है ? धन किससे मिलता है ? कीर्ति किससे मिलती है; किससे इस लोक से परलोक को प्राप्त हो कर मनुष्य सोच नहीं करता?" ___ गौतम-"श्रद्धावान् अप्रमत्त विचक्षण पुरुष निर्वाण की प्राप्ति के लिये आईत धर्म को सुन्न पा से प्रज्ञा प्राप्त करता है। प्रत्युपकारी सहनशील पुरुप उत्यान अर्थात आलस्य-शग से धन प्राप्त करता है, सत्र से कीर्ति प्राप्त करता है और दान से मित्र मिलते हैं। जिस गृहस्य में सत्य, धर्म, धृति और त्याग नामक चार धर्म होते हैं, वही मरकर इस लोक से परलोक को प्राप्त होकर सोच नहीं करता। बह-करं पुसमवे पन कयं मुयिन्दते धनं । कयं मुकिति पप्पोति कनिधानि गन्नति ॥ अस्मासोकापरतो कार्य पवननोति।

  • गोतम मानो जहत पम्न निम्यानपधिवा ।

भुस्यूमा लमठे पानं अप्पमतो विषयतो। पविरूपफरी पुरया उद्याना यिंदते धनं । मरर फिक्ति पापोति दर्द मित्रानि गंधति । यसेवेपतुरो पम्मा सदस्स परमेसिनी सर्व धम्मो पिढी पागोसचे पेव न सोचति । सला लेाफा परलोकं स दे पेपन शोषति । - - -