पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२०२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( १८६ ) सकता कि जिनके राग में वे प्रायश्चित्तीय ठहरें।" जब देवदत्त भगवान बुद्धदेवकीसम्मति न मिलने से निराश हो गया,तब वह यह कहकर उनके पाससे विदा हुआ कि चाहे जो हो,मैं और मेरे अनुयायी भिक्षु इन पाँच प्रस्तावित नियमों का अवश्य पालन करेंगे। • भगवान बुद्धदेव ने देवदत्त का यह आचरण देखकर कहा- "देवदत्त, तुमने अच्छा नहीं किया, संघ में भेद उपस्थित किया। जो संघ में भेद उपस्थित करता है, संसार में उससे बढ़कर कोई पापी नहीं हो.सकता" . सुकर साधुनासाधु साधु पापेन दुक्करं। . . . पापं पापेन सुकरं पापं येहि दुक्करं ।। ....' साधु के लिये अच्छा काम करना सुगम है, पर वही अच्छा काम दुष्ट मनुष्य के लिये कठिन है । वैसे ही दुष्ट के लिये बुरा काम करना सुगम है, पर साधु के लिये उसी का करना महा कठिन है। • यहाँ से देवदत्त अपने शिष्यों सहित गया को चला गया और वहाँ रह कर उपदेश करता रहा । उसके चले जाने पर भगवान में राजगृह से सारिपुत्र और मौद्गलायन को गया में मेजा और जब देवदत्त आलस्य-अस्त हो गया, तब सारिपुत्र और मौद्गलायन ने पारी पारी से भिक्षु संघ को मध्यमा प्रतिपदा का उपदेश करना प्रारंभ किया और सबको स्पष्ट रूप से यह समझा दिया कि निर्वाण न तो दुःख सहन से प्राप्त हो सकता है और न सुख में लिप्त होने से पाप्त हो सकता है। गीता में भगवान ने कदा है-