पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२०३

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( १९० ) योगयुक्तो मुनिब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति। . सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ . . उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । • आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ ___अर्थात् योगयुक्त मुनि ब्रह्म को शीघ्र नहीं प्राप्त होता; पर जिसने ममत्व का नाश कर सब भूतों को अपनी आत्मा जाना है, वह सब कुछ करता हुआ भो कर्म दोष से लिप्त नहीं होता। इसलिये मनुष्य को अपने आप अपना उद्धार करना चाहिए और अपने शरीर को कष्ट नहीं देना चाहिए । मनुष्य आप हो अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है। . दूसरे दिन जव सारिपुत्र और मौद्गालायन गया से राजगृह को चले, वत्र देवदत्त के साथ के सत्र भिक्ष उसे छोड़कर उनके साथ चले गए और देवदत्त अकेला रह गया । . जव देवदत्त को भिक्षओं ने त्याग दिया तब तो देवदत्त का क्रोध.और भो भड़क और वह भगवान् बुद्धदेव के प्राण लेने के प्रयत्न में लगा। O