पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२२२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( २०९ ) इस विपय पर सन्मति मांगी है, कि मैं यदि महा समृद्धिशाली वृजि जाति पर आक्रमण करूँ तो उनका ध्वंस कर सकूँगा वा नहीं ?" महात्मा बुद्धदेव ने वर्पकार की बात सुनकर थोड़ी देर विचार कर उससे कहा-“हे ब्राह्मण ! जब तक वृजि जाति में.ऐक्य है, वा जब तक वे मिलकर कान करते रहेंगे, वा जव तक वे लोग सदाचार और सत्प्रथा का पालन करते रहेंगे, जब तक उनमें वृद्ध जनों का सम्मान रहेगा, वा जब तक उनमें कुल-स्त्री और कुमारियों का आदर और सम्मान रहेगा, वा जब तक वे लोग चैत्यों की वंदना और पूजा करते रहेंगे, वा जब तक वे अहेत् पूज्य पुरुषों की रक्षा और पालन करते रहेंगे, तब तक वृजि जाति के अधःपतन की संभावना नहीं है । उसकी क्रमशः वृद्धि होती जायगी।" भग- वान बुद्धदेव का उत्तर सुन वर्षकार ने कहा-"भगवन् ! जव इन सातों धर्मों में से एक का भी पालन करने से वृजि जाति का ध्वंस नहीं हो सकता और जव उनमें ये सब हैं, तव उनके अभ्युदय और सौभाग्य-वृद्धि में आश्चर्य ही क्या है । हे गौतम ! वृजि जाति में परसर भेद कराना अत्यंत कठिन है । अवश्य अजावरानु का उनके ध्वंस के लिये तैयारी करना व्यर्थ है।" यह कहकर भगवान बुद्धदेव की आज्ञा ले वर्षकार गृधूकूट से राजगृह चला गया। ___ उसके दो ही चार दिन बाद बुद्धदेव ने आनंद को आज्ञा दी कि भिक्षुसंघ को उपस्थान-शाला में आहवान करो। आनंद ने उनकी आज्ञा पाकर मिक्षुसंघ को उपस्थान-शाला में आमंत्रित किया। संघ के सव लोगों के आ जाने पर भगवान बुद्धदेव ने उनसे