पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२२१

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. (३६) महापरिनिर्वाण . ये तरंति एणवं सेतुकला न विसजपलानि । कुल्लं हि जनो पबंधति तिराणां मेधाविनी जनाति ।। ... महात्मा बुद्धदेव अपना पैंतालीसवाँ चातुर्मास्य श्रावस्ती में व्यतीत कर वहाँ से राजगृह को चले। मार्ग में फपिलवस्तु के खंडहर को जिसे प्रसेनजित् के पुत्र विरूदक ने कपिलवस्तु को ध्वंस कर के अवशिष्ट छोड़ दिया था, देखते हुए मल्ल आदि के राज्यों से होकर वे राजगृह पहुँचे । राजगृह में वे गृध्रकूट पर्वत पर ठहरे । उस समय मगधाधिप महाराज अजातशत्रु वृजि जाति पर पाकमण करने की तैयारी कर रहे थे। मंत्रि-परिपद को महाराज अजातशत्रु ने इस . काम के लिये आहत किया और उन लोगों के सामने अपना वह विचार उपस्थित किया । मंत्रियों में इस विषय पर वाद विवाद हुआ और उनमें से बहुतेरों को यह सम्मति हुई कि इस विषय में महा- त्मा बुद्धदेव की भी सम्मति, जो उस समय दैवयोग से गृध्रकूट पर विराजमान थे, ली जाय । सर्वसम्मति के अनुसार परिपद् ने यह निश्चय किया कि परिषद की ओर से महात्मा बुद्धदेव की सम्मति लेने के लिये वर्पकार उनके पास भेजा जाय । ___ वर्षकार महाराज अजातशत्रु की ओर से महात्मा बुद्धदेव की सेवा में उपस्थित हुआ और एकांत में जब महात्मा बुद्ध के पास आनंद के अतिरिक्त और कोई न रह गया,तब उसने उनसे सानुनय निवेदन किया-"महाराज! अजातशत्रु ने हाथ जोड़कर आप से