पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२३९

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( २२६ ) बात की बात में घोर जनक्षय हुआ चाहता है, तब वे सब लोगों के चीच में खड़े होकर उच्च स्वर से सब को संबोधन करके बोले- सुणंतु भोन्तो मम एक वाक्यं अम्हाकं बुद्धो अह खन्तिवादी . . नहि सधऽयं उतम पुग्गलस्स . सरीरंभगे सिया संपहारो। . सवेव भोन्तो सहिता समग्गा सम्मोदमाना करोमट्ठभागे। वित्थारिका होन्ति दिसासु थूपा बहुज्जना चक्खुमंतो पसन्ना । इति । क्षत्रिय वर्ग ! आप लोग मेरी वात सुनिए । हमारे महात्मा बुद्ध शांतिवादी थे। यह उचित नहीं है कि ऐसे महापुरुष की मृत्यु पर आप लोग घोर संग्राम मचावें । आप लोग सावधान हो शांति धारण करें । मैं उनकी अस्थियों के अवशेप के आठ भाग किए देता हूँ। यह अच्छी बात है कि सब दिशाओं में उनकी धातु पर स्तूप बनवाए जाय और सब लोग जिन्हें आँख है, उसे देखकर प्रसन्न हों। ___ द्रोणाचार्य की यह वात नकर सब लोग शांत हो गए। द्रोण ने भगवान् बुद्धदेव के धातु के आठ भाग करके एक एक भाग कुशीनगर, पावा, वैशाली, कपिलवस्तु, रामग्राम, अल्लकल्प, राज- गृह के क्षत्रियों और वेठद्वीप के ब्राह्मणों को दे दिया। इसके बाद पिप्पलीय बन के मोरिय क्षत्रियों का दूत अपने भाग के लिये पहुँचा:।