पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२४१

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(३७) वौद्ध धर्म महात्मा बुद्धदेव के परिनिर्माण के बाद ५०० भिनु राजगृह का सप्तपर्णी गुहा में उनके उपदेशों का संग्रह करने के निमित्त एकत्र हुए और उनके उपदेशों को तीन बड़े बड़े संग्रहों में उन्होंने संगृहीत किया। इस संग्रह में कितने भागथे और यह कितना बड़ा था,इसका ठीक पता चलना बहुत कठिन है। पर फिर भी यह अनुमान होता है कि यह संग्रह वर्तमान हीनयान और महायान के त्रिपिटक को अपेक्षा अवश्य छोटा रहा होगा । इन दोनों त्रिपिटकों में पठित कति- पय गाथाओं के मिलान से यह अनुमान होता है कि वे एक दूसरे को छाया नहीं है, किन्तु वे एक तीसरे की छाया है जो दोनों से प्राचीनतर थी। कितने विद्वानों का अनुमान है कि त्रिपिटक में सूत्रपिटक * प्राचीनतम है और उनका ऐसा अनुमान कई कारणों से युक्तियुक्त भी प्रतीत होता है । यदि थोड़े काल के लिये हम उनकी यह वात न मानकर यही माने कि उनके शिष्यों ने सूत्रपिटक के अतिरिक्त अभिधर्म और विनयपिटक का भी संग्रह प्रथम धर्म-संघ में किया, तो भी हमें यह मानना पड़ेगा कि आदिम त्रिपिटक के जितने अंश सूत्रपिटक में हैं, अभिधर्म और विनय में उतने नहीं हैं; अथवा वह

  • इसमें पुनदेय पो उपदेशों का घटनासहित पणन है।