पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


राजमार्ग पर कोई बुड्ढा या रोगी इत्यादि न दिखाई पड़े और चारों ओर के स्थान ध्वजा तोरणादि से सुसज्जित किए जायें। नगर वात की वात में सब प्रकार सुसजित किया गया। कुमार के लिये उत्तम स्थ प्रासाद के द्वार पर लाया गया। कुमार ने सैर करने की तैयारी को और वे प्रासाद से उतरे और रथ पर चढ़े। सारथी ने घोड़े की वाग पकड़ी और उसको चावुक लगाई। रथ राजमार्ग से होता हुआ आगे बढ़ा। जिस ओर नगर में कुमार जाते थे, चारों ओर ध्वजा, पताका, तोरण आदि से सुसज्जित प्रासादों से स्त्रियाँ पुष्प-वृष्टि करती थीं। रथ नगर के पूर्व द्वार से निकला। पर देव- योग से कुमार को सड़क पर एक वृद्ध पुरुप दिखाई पड़ा । बुढ़ापे के कारण उसकी पीठ मुक गई थी और सारे शरीर पर मुर्रियाँ पड़ी थीं। उसकी आँखो की ज्योति धीमी हो गई थी, कानों से सुनाई नहीं पड़ता था। सव इंद्रियों ने जवाब दे दिया था। वह लाठी टेकता हुआ सड़क पर जा रहा था। सारथी उसे मार्ग से हटाने के लिये बहुत चिल्लाया, पर बहरा बूढा मार्ग से न हटा और अपनी लाठी टेकता हुआ सड़क के बीच से चलता रहा। सारथी ने विवश हो घोड़े की लगाम खींची और रथ रोका। अचानक कुमार की दृष्टि उस ज़राग्रस्त बुड्ढ़े पर.जा पड़ी। साधारण मनुष्यों और महात्माओं के जीवन में यही अंतर है कि साधारण मनुष्य अपने जीवन में सांसारिक घटनाओं को देखता हुआ.उनसे उपदेश ग्रहण नहीं करता। नित्य तरह तरह की घट- नाएँ हुआ करती हैं, पर वह उन पर कुछ ध्यान नहीं देता। पर महात्मा