पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५५

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सारथी का यह उत्तर सुन अत्यंत विस्मित हो विचार करने लगे कि जरा क्या वस्तु है ? क्या जरा किसी जाति विशेप को ही पीड़ित । करती है वा सर्वसाधारण पर आक्रमण करती है ? और जब वे अपने इन कुतूहलों का संतोपजनक समाधान न कर सके, तब उन्होंने फिर सारथी से पूछा- कुलधर्म एप आयमस्य हि त्वं भणाहि 'अथवापि सर्वजगतोऽय इयं व्यवस्था । शीव भणाहि वचनं यथभूतमेतत् श्रुत्वा तथार्थमिह योनि संचिंतयित्वा ।। सारथी ! यह वतला कि क्या यह इसका कुलधर्म है अथवा समस्त संसार की यही व्यवस्था है ? मुझे इसका शीन उत्तर दे कि क्या जिस कुल में यह पुरुप उत्पन्न हुआ है, उसी कुल के लोग जरा- अस्त होते हैं या संसार के सव प्राणी जराग्रस्त होंगे ? तेरा उत्तर सुनकर मैं इसका निदान सोचूंगा। कुमार का यह प्रश्न सुन सारथी ने कुमार से कहा- नेतस्य देव कुलधर्मो न राष्ट्रधर्मः सर्वे जगस्य जर यौवन धर्पयाति । । तुभ्यपि मावृपितृवांघवज्ञातिसंघो जरया अमुक्तं नहि अन्यगतिर्जनस्य ॥ देव ! जराग्रस्त होना न इस मनुष्य का कुलधर्म है और न जरा राष्ट्रधर्म है । समस्त जगत् के यौवन को जरा ध्वस्त करती है। यह न आपको छोड़ेगी, न आपके माता पिता को छोड़ेगी और न इससे