पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५७

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हा आनेवाली जरा को दूर करने की चेष्टा नहीं करता। क्या कोई उपाय है कि जरा से मनुष्य वच सके ? क्या वैद्यों के पास कोई जरा नामक महाव्याधि का औपध है ? यदि नहीं तो उन लोगों ने क्यों इसके हटाने की आज तक चिंता नहीं की ? क्या यह असाध्य रोग है ? पर यदि यह रोग है तो किसी एक को होना चाहिए; यह तो संसार के सभी जड़ चेतन.पर आक्रमण करता है । क्या यह अवस्था है ? क्या इस अवस्था से बचने का कोई उपाय है वा हो सकता है ? इस प्रकार की वातों को कुमार कई दिनों तक बार बार सोचते रहे।

 कुछ दिनों के बाद एक दिन कुमार ने फिर नगर के बाहर जाने का संकल्प किया। महाराज शुद्धोदन ने फिर नगर में घोषणा करा दी और कुमार के लिये सारथी रथ ले प्रासाद के द्वार पर आउपस्थित हुआ । सिद्धार्थ कुमार ने प्रासाद से निकल और रथ पर बैठ सारथी से रथ हाँकने को कहा । कुमार नगर की. शोभा देखते हुऐ रथ पर जा रहे थे। रथ नगर के दक्षिण द्वार से निकला । पर दैवयोग से नगर के बाहर कोई पुरुष असाध्य रोग से ग्रस्त था । रोगी बहुत दुर्बल हो गया था और उसके कुटुंबियों ने उसे घर के बाहर सड़क के पास धूप में लेटा दिया था। उसकी असाध्य अवस्था देख उसके घरवाले उसके पास बैठे रोते थे । कुमार का रथ ज्यों ही उस स्थान पर पहुँचा, दैववश कुमार की दृष्टि उस रोगी पर पड़ी । कुमार, जिन्होंने

आज तक रोग का नाम भी नहीं सुना था, उसे देखकर बड़े कुतूहल से सारथी से पूछ बैठे-. ....