पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५८

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किं सारये पुरुषरूप विवर्णगात्रः सर्वेद्रियेभि विकलो गुरुपवसंतः। सर्वांगशुष्क उदराकुल प्राप्तकृच्छा . मूचे पुरीष स्वकि तिष्ठति कुत्सनीयः हे सारथी, इस पुरुष का गान क्यों विवर्ण हो गया है ? इसकी सव इंद्रियाँ क्यों विकल हैं ? यह क्यों लंबी साँस ले रहा है ? इसके सब अग क्यों सूख गए हैं ? इसका पेट क्यों फूल आया है , ? यह क्यों दुःखी है और अपने मूत्र-पुरीप में पड़ा हुआ है ? कुमार का यह षेचन सुन सारथी ने सविनय निवेदन किया- एपो हि देव पुरुषो परमं गिलानो च्याधीभयं उपगतो मरणांत प्राप्तः। आरोग्य तेजरहितो बलविज़हीनो अत्राणवो प्रसरणो ह्यपरायनश्च ।। देव ! इसे रोग हो गया है । इसे बड़ी ग्लानि है । इसके मरने का समय आगया है। इसका आरोग्य और तेज जाता रहा है। यह चल-वीर्यहीन हो गया है। इसके वचने की कोई आशा नहीं है। यह अशरण होकर यहाँ पड़ा है। . ___ कुमार को सारयो को यह बात सुन बड़ी चिंता हुई । वे सोचने लगे कि व्याधि क्या वस्तु है ? क्या कोई ओषधि ऐसी नहीं है जो व्याधि को संसार से जड़ से दूर कर दे और इसका नाम भी न सुनने में आवे ! इस समय सिद्धार्थ को सांख्य का दूसरा सून "नदृष्टा- तसिद्धिनिवृत्तेपि अनुवर्तदर्शनात् ॥ याद आया। उन्होंने अपने