पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/९६

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जिसकी ज्योति प्रवृत्तमान हो, (२) ऋतंभरप्रज्ञ वा मधुभूमिक जिसने ऋतंभर नाम की प्रज्ञा, जो सबीज समाधि की चतुर्थ निर्विचार अवस्था में प्राप्त होती है, प्राप्त कर ली हो, (३) प्रज्ञा- ज्योति वा भूतेंद्रियजयी अर्थात् जिसने संयमादि से भूतेंद्रियों को . जीत लिया हो और (४) अतिक्रांत. भावनीय जिसने अपनी समस्त भावित और भावना करने योग्य भावनाओं को रक्षाबंध कर अपना कर्तव्य कर लिया हो और अपने सव साधनों को संपन्न कर लिया हो। इन चारों प्रकार के योगियो में स्थानीय देवगण, दूसरे प्रकार के योगी के पास, जब वह मधुभूमि में पहुँचता है, आकर उसे अनेक प्रकार के भोग-ऐश्वर्या आदि की प्रलोभना दिखाते हैं और उसे भ्रष्ट करने की चेष्टा करते हैं। उस समय यदि योगी उनको प्रलोभनाओं में न पड़ा तो वह निर्वीज' समाधि प्राप्त कर कैवल्य. पद को पहुँच जाता है। अन्यथा बह फिर जन्म मरण के क्लेश में फंसकर दुःख में पड़ता है। ___ इससे इस बात का अनुमान होता है कि योग की समाधि में जो अड़चनें पड़ती हैं, उनमें कामना वा इच्छा सव से प्रबल वाधक है; और यदि कोई पुरुप कामना को अतिक्रमण कर ले जाय तो वह निश्वितमतिः समाधि भावयेत् । नगमकृत्वा स्मयमपि न कुर्यात् एपमहं देवा- नामपि प्रार्थनीय इति, स्मयादयं मुस्थितं मन्यतया मृत्युमा फेरोपुगृहीत- मियाला न भाविष्यति, याच अस्य सिद्धान्तरमेशी नित्यं यलोप- पर्य:प्रमादोलब्धवियर क्लेशानुन भविष्यति, ततः पुनरनिष्टमसंगः, स्यमस्व संगस्मयायकु तो भावितोयी ढीमयिष्यति, भावनीयद्यार्थोऽभिषि- यतीति।