पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/५०

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जैसे अमीर के मन में वैसे ही शाहजादी के भी मन में प्रेम का बीज आरोपित हो चुका था और उनकी परस्पर प्रीति बढ़ती ही जाती थी। अब उनका यह भाव आपस में छिप नहीं सकता था। दोनों की आँखें मिलते ही शाहजादी के बर्ताव में जो एक प्रकार की चंचलता दीख पड़ती थी, उससे तो यह बात स्पष्ट हो जाती थी कि उसके मन पर प्रेम का पूरा असर हो चुका है। उसके भाषण और नेत्र-संकेत से ऐसा मालूम होता था कि वह बिलकुल परवश हो गई है। अस्तु, उसकी यह दशा देख अमीर को विश्वास हुआ कि ऐसे समय पर यदि अपना मनोगत विचार शाहजादी को बतलाया जावे तो अपमानित होने का डर नहीं है। इसलिए एक दिन शाहजादी को प्रसन्न मुद्रा में देख उसने अपना विचार प्रगट किया। उसका परिणाम भी कुछ खराब न हुआ। शाहजादी लज्जा से मुस्करा कर नीचे देखने लगी।

अमीर आनन्दातिशय से प्रफुल्लित होकर बोला कि––"ऐ शाहजादी, इसमें कुछ शक नहीं कि थोड़े दिन पहले मैं इस महल में गुलाम होकर रहता था। पर मेरा जन्म अच्छे राजघराने में हुआ है। मैं समझता हूँ कि मेरे योग से तुम्हारे बड़प्पन में किसी तरह का कलंक नहीं लग सकता।"

"ऐ अमीरुल अमरा" शाहजादी ने कहा, "अपने जन्म का साथी और सुख-दुख का भागी ढूँढ़ने में बहुत होशियारी से काम करना चाहिए। ऐसे समय कुल की अपेक्षा शील ही का अधिक महत्व है। धन-दौलत और कुल तो जन्म ही से प्राप्त होते हैं, परन्तु सत्य, शील और उत्तम नीति सहज नहीं मिलती। श्रीमान मनुष्य मिलना कठिन नहीं है। इस दरबार में ऊँचे कुल के बड़े लोग मैंने कई देखे हैं। आज तक यहाँ ऐसे सैकड़ों अमीर आ चुके जो अपने तईं बादशाह से भी बढ़कर