पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/५५

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इस पर अल्ली ने पूछा कि, "तुम अपने साथियों में जाकर फिर हमारे पास लौट आवोगे, इसका हमें विश्वास कैसे हो सकता है?"

"यह मेरा लड़का तुम्हारे पास जामिन रहेगा।"––झबेला ने अपने पुत्र की ओर अँगुली बतलाकर कहा, "वह मुझे प्राण से भी अधिक प्यारा है। सुलियट लोग मेरी अपेक्षा उसी को अधिक मानते हैं।"

पाशा ने उसका कहना कबूल किया, और झबेला अपने लड़के को उसके पास छोड़कर घर लौट आया। परन्तु उसने दीन होकर अल्ली का अधिकार मान्य करने के लिए अपने लोगों से विनती नहीं की। इसके पलटे ऐसा कहा कि "तुम लोग जितना अभी लड़ रहे हो, उसकी अपेक्षा अधिक धैर्य और आवेश से लड़कर अपनी रक्षा करो। कुछ भी हो जाय, अल्ली के अधिकार का भार अपने सिर पर मत लेओ।" इतने में किसी ने उसके पुत्र का स्मरण किया और पूछा कि उसकी क्या दशा होगी? तब तो उसके अंतःकरण में एक ओर से अपने राष्ट्र को स्वतन्त्र करने की प्रबल इच्छा और दूसरी ओर से स्वाभाविक पुत्र-प्रेम, इन दोनों का तुमुल युद्ध होने लगा। झबेला सचमुच देशाभिमानी वीर पुरुष था! अनिवार्य पुत्र-प्रेम के मोहपाश को भी हटाकर उस स्वातंत्र्यप्रिय पुरुष का मन तिल मात्र दुखित नहीं हुआ, वरन् अपने साथियों को जय की आशा से उत्साहित कर युद्ध की सिद्धता करने के लिए बड़े आवेश से प्रार्थना करने लगा।

कुछ काल बीत जाने पर उसने अल्ली पाशा को लिख भेजा कि "ऐ पाशा! मैं सेर को सवासेर हूँ!! मुझे इस बात का परम संतोष है कि तेरे पास से छूटकर अपने देश को पराधीनता से मुक्त करने के लिए मैं यहाँ आ गया। अब मुझे यह आशा नहीं है कि मेरे प्रिय पुत्र के प्राण बचेंगे। परन्तु इसका बदला लिए बिना मैं कभी न रहूँगा। दूसरों की स्वतंत्रता हरण करने वाले तेरे सरीखे जो अधम मनुष्य हैं,