पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१२२

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नराश्य न-हो पाखडी है । लेकिन मेरी सलहज ने धोखा दिया, नहीं तो मैं ऐसे पाजियों के पंजे में कब आनेवाला था। एक ही सुअर है। पिताजी-बेटा, सब्र करो। ईश्वर को जो कुछ मजूर था वह हुआ। लड़का- लड़की दोनों ही ईश्वर की देन हैं, बहाँ तीन हैं वहाँ एक और सही। पिता और पुत्र में तो यह बातें होती रही । पामर, मौरशिकार आदि ने अपने- अपने डडे सॅभाले और अपनी राह चले, घर में मातम-सा छा गया, लेडो डाक्टर भी मिदा कर दी गई, सौर में जच्चा और दाई के सिवा कोई न रहा। वृद्धा माता तो इतनी हताश हुई कि उमो वक्त अटवास-खटवास लेकर पा रहीं। जब बच्चे को परहो हो गई तो घरण्डोलाल स्त्री के पास गये और सरोष भाव से पोले-फिर लड़की हो गई ! निरुपमा-क्या करूँ, मेरा क्या वश ? घमण्डीलाल-उस पापो धूर्त ने पता चकमा दिया । निरुपमा -अम क्या कहूँ, मेरे भाग्य ही में न होगा, नहीं तो वहाँ कितनी हो औरतें घाबाजी को रात-दिन घेरे रहती थीं। वह किसी से कुछ लेते तो कहती कि धूर्त हैं, कसम ले लो जो मैंने एक कौड़ो भी उन्हें दी हो। घमण्डीलाल-उसने लिया या न लिया, यहाँ तो दिवाला निकल गया। मालूम हो गया, तकदीर में पुत्र नहीं लिखा है। कुल का नाम डूबना हो है तो क्या बाज डूबा, क्या इस साल बाद डूया। अब कहीं चला जाऊँगा, गृहस्थी में कौन-सा सुख रखा है। वह बहुत देर तक खड़े-खड़े अपने भाग्य को रोते रहे, पर निकामा ने सिर तक न उठाया। ( ४ ) निरुपमा के सिह फिर वही विपत्ति आ पड़ो, फिर वहीं ताने, वही अपमान, वही अनादर, वही छीछालेदर, किसो को चिन्ता न रहती कि खाती-पीती है या नहीं, अच्छो है या बीमार, दुखी है था सुखी । घमडीलाल यद्यपि कहीं न गये, पर निरुपमा को यह धमकी प्रायः नित्य ही मिलती रहती थी। कई महीने योहो गुजर गये तो निरु- पमा ने फिर भावज को लिखा कि तुमने और भो सुझे विपत्ति में डाल दिया। इससे तो पहले ही भली थी। अब तो कोई बात भी नहीं पूछता कि मरती है या जोती है।