पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१२१

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११. मानसरोवर पिताजी खिलकर पोले-अबे, कितना खायेगा, खिला-खिलाकर पेट फाड़ दूंगा। सहसा महरी घर में से निकली । कुछ घमराई-सी थी। वह अभी कुछ बोलने भो न पाई थी कि मौरशिकार ने बन्न फैर कर ही तो दी। पन्दूक छूटनी थी कि रौशनचौकी की तान भी छिड़ गई, पामर भी कमर इसकर नाचने को खड़ा हो गया। महरी-अरे, तुम सब-के-सब भग खा गये हो क्या ? मौरशिकार क्या हुआ क्या ? महरी-हुआ क्या, लड़की हो तो फिर हुई है ! पिताजी-लड़की हुई है ? यह कहते-कहते वह कम थामकर बैठ गये मानो वज्र गिर पड़ा। घमण्डोलाल कमरे से निकल जाये और बोले-जाकर लेडी डाक्टर से तो पुछ । अच्छी तरह देख लें। देखा न सुना, चल खड़ी हुई। महरी-माबूजी, मैंने तो आँखों देखा है। घमण्डीलाल-~-कन्या ही है। पिता-हमारी तकदीर ही ऐसी है बेटा ! जाओ रे सब-के-सब ! तुम सभों के भाग्य में कुछ पाना न लिखा था तो वहां से पाते। भाग नाभो। सैकड़ों रुपये पर पानी फिर गया, सारी तैयारी मिट्टी में मिल गई। घमण्डीलाल-इस महात्मा से पूछना चाहिए। मैं आज डाक से जाकर बचा को खबर लेता हूँ। पिताजी-धूर्त है, धूर्त ! घमण्डीलाल-मैं उनकी सारी धूर्तता निकाल देगा। मारे ९डों के खोपड़ी न तोड़ दे तो कहिएगा। चांडाल कहाँ का। उसके कारण मेरे सैकड़ों रुपयों पर पानी फिर गया। यह सेजगादी, यह गाय, यह पालना, यह सोने के गहने, किसके सिर पट.? ऐसे ही उसने कितनों ही को ठगा होगा। एक दफा बचा को मरम्मत हो माती तो ठीक हो जाते। पिताजी-बेटा, उसका दोष नहीं, अपने भाग्य का शेष है। घमण्डोलाल-उसने क्यों कहा कि ऐसा नहीं, ऐसा होगा । औरतों से इस पाखर के लिए कितने ही रुपये ऐंठे होंगे। वह सब उन्हें उगलना पड़ेगा, नहीं तो पुलीस में रपट कर दूंगा। कानून में पाखड का भी तो दण्ड है। मैं पहले ही चौंका था कि हो- 1