पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१३५

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१३४ मानसरावर 1 सिनहा-तो निकालो, दे ही है। जिन्दगी में यह बात भी याद रहेगी। पत्नीजी ने अविश्वास के भाव से कहा-चलो, मैं भी चलतो हूँ। इस वक्त कौन देखता है। पत्नी से अधिक पुरुष के चरित्र का ज्ञान और किसी को नहीं होता। मिस्टर सिनहा की मनोवृत्तियों को उनकी पत्नीजी खूब जानती थी। कौन आने रास्ते में रूपये कहीं छिपा है और कह दें, दे आये। या, कहने लगें, रुपये लेकर भी नहीं टलता तो मैं क्या करूँ । जार सन्दुक से नोटों के पुलिदे निकाले और उन्हें चादर में छिपाकर मिस्टर सिनहा के साथ चलौं । सिनहा के मुंह पर माहू-सो फिरी हुई थी। लालटेन लिये पछताते चले जाते थे, ५०००) निकले जाते हैं ! फिर इतने रुपये का मिलेंगे, कौन मानता है। इससे तो कहीं अच्छा था कि दुष्ट मर हो जाता। बला से बदनामी होती, कोई मेरी जेब से रुपये तो न छीन लेता। ईश्वर करे, भए गया हो। अभी दोनों आदमी फाटक हो तक आये थे कि देखा, जगत पड़ेि लाठी टेकता चला आता है । उसका स्वरूप इतना डरावना था मानों श्मशान से कोई मुरदा भागा भाता हो। इनको देखते ही जगत पड़ेि बैठ गया और हापता हुआ बोला-बड़ी देर हुई, लाये? पत्नीजी बोली- महाराज, हम तो आ हो रहे थे, तुमने क्यों कष्ट किया । रुपये लेकर सीधे घर चले जाओगे न ? जगत-हाँ हाँ, सोधा घर जाऊगा । कहाँ हैं रुपये, देखू । पत्नीजी ने नोटों का पुलिदा बाहर निकाला और लालटेन दिखाकर बोली- गिन लो। पूरे ५०००) रुपये हैं। पाड़े ने पुलिंदा लिया और बैठकर उसे उलट-पुलटकर देखने लगा। उसकी आँखें एक नये प्रकाश से चमकने लगी। हार्थों में नोटों को तौलता हुआ बोला-पूरे पांच 1 हजार हैं। पत्नी-पूरे, गिन की। जगत-पांच हजार में तो टोकरी भर जायगी ! (हार्थों से बताकर ) इतने सारे हुए पांच हजार ! JOM