पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१४

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विश्वास

क्षुधा से व्याकुल होकर भीख भी माँगी। मज़दूरी करने को तो मैं बुरा समझता, आज भी मज़दूरी ही करता हूँ। भीख माँगनी भी किसी-किसी दशा में क्षम्य है, लेकिन मैंने उस अवस्था में ऐसे-ऐसे कर्म किये, जिन्हें कहते लज्जा आती है-चोरी की, विश्वासघात किया, यहाँ तक कि चोरी के अपराध में क़ैद की सजा भी पाई।

मिस जोशी ने सजल-नयन होकर कहा-आप यह सब बातें मुझसे क्यों कह रहे हैं? मैं इनका उल्लेख करके आपको कितना बदनाम कर सकती हूँ, इसका आपको भय नहीं है?

आपटे ने हँसकर कहा-नहीं, आपसे मुझे यह भय नहीं है।

मिस जोशी-अगर मैं आपसे बदला लेना चाहूँ तो?

आपटे-जब मैं अपने अपराध पर लज्जित होकर आपसे क्षमा माँग रहा हूँ, तो मेरा अपराध रहा ही कहाँ जिसका आप मुझसे बदला लेंगी। इससे तो मुझे भय होता है कि आपने मुझे क्षमा नहीं किया। लेकिन यदि मैंने आपसे क्षमा न माँगी होती तो भी आप मुझसे बदला न ले सकतीं। बदला लेनेवालों की आँखें यों सजल नहीं हो जाया करतीं। मैं आपको कपट करने के अयोग्य समझता हूँ। आप यदि कपट करना चाहतीं तो यहाँ कभी न आतीं।

मिस जोशी-मैं आपका भेद लेने ही के लिए आई हूँ।

आपटे-तो शौक से लीजिए। मैं बतला चुका हूँ कि मैंने चोरी के अपराध में क़ैद की सज़ा पाई थी। नासिक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत न हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे काम-चोर समझकर बेंतों से मारते थे। आखिर एक दिन मैं रात को जेल से भाग खड़ा हुआ।

मिस जोशी-आप तो छिपे रुस्तम निकले।

आपटे-ऐसा भागा कि किसी को खबर न हुई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ५००) इनाम भी है।

मिस जोशी-तब तो मैं आपको जरूर ही पकड़ा दूँगी।

आपटे-तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बतलाये देता हूँ। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलीस से बचने के लिए रख छोड़ा है।

बालक अब तक तो चुपचाप बैठा हुआ था। मिस जोशी के मुँह से पकड़ाने की