पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१५६

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फरमान पर हस्ताक्षर कर दिये । कलम के एक चिह से प्रजा को पांच करोड़ वार्षिक कर से मुक्ति हो गई । लैग का मुख गर्व से आरक हो गया। जो फाम बरसों के आन्दोलन से न हो सकता था, वह प्रेम-कटाक्षों से दिनों में पूरा हो गया। • यह सोचकर वह फूली न समाती थी कि जिस वक यह फरमान सरकारी पत्रों में प्रकाशित हो जायगा और व्यवस्थापक सभा में लोगों को इसके दर्शन होंगे उस वक्त प्रजा वादियों को कितना आनन्द होगा। लोग मेरा यश गायेंगे और मुले आशीर्वाद देंगे। नादिर प्रेम-मुग्ध होकर उसके चन्द्र मुख को ओर देख रहा था, मानों उसका वश होता तो सौन्दर्य की इस प्रतिमा को हृदय में दिठा लेता। - सहसा राज-भवन के द्वार पर शोर मचो लगा। एक क्षण में मालाए हुआ कि बनता जा टोडो-दल, अस्त्र शस्त्र से सुप्तजित, रागद्वार पर खड़ा दीवारो को तोड़ने को चेष्टा कर रहा है । प्रति क्षण शोर बढ़ता जाता था और ऐसी आशा होतो थो कि क्रोधोन्मत्त जनता द्वारा को तोड़कर भीतर घुस आयगी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि कुछ लेग सोढ़िया लाकर दोवार पर चढ़ रहे हैं। लैला राजा और ग्लानि से सिर झुकाये खड़ी थी। उसके मुख से एक शब्द भी न निकलता था। क्या यही वह जनता है, जिसके कष्टों को कथा कहते हुए उसको वाणो उन्मत्त हो जातो थो ? यही वह अशक, दलित, क्षुधा पीड़ित, अत्याचार की वेदना से तड़पती हुई जनता है, जिस पर वह अपने को अर्पण कर नुकी थी ? नादिर भी मौन खता था, लेकिन लज्जा से नसो, क्रोध से । उम्बका मुख तमतम्रा उठा था, भांखों से चिनगारियां निकल रही थी, बार बार ओठ दाता और तलवार के छब्जे पर हाथ रखकर रह जाता था। वह बार-बार लेला की भोर सतप्त नेत्रों से देखता था। पारा से इशारे की देर थी। उसका हुक्म पाते हो उसकी सेना इस विद्रोही दल को यों भगा देगो जैसे आँधो पत्तों को उसा देती है। पर लैला से आँखें न मिलती थी। आखिर वह अधीर होकर बोला--लैला, मैं राज-सेना को बुलाना चाहता हूँ। क्या कहती हो?