पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१७३

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. रहमान फूट-फूट कर रोने लगा। दाऊदयाल ले अटकल से समम लिया, इसकी भामर गई । पूछा-थयों रहमान, तुम्हारी मा सिधार तो नहीं गई? रहमान-हाँ इजर, आज तीसरा दिन है। दाऊ-रोन, रोने से क्या फायदा १ सव्र करो, ईश्वर को जो मजूर था, वह हुआ। ऐषो मौत पर गम न करना चाहिए । तुम्हारे हाथों उनको मिट्टी ठिकाने लग गई, अब और क्या चाहिए ? रहमान हजूर, कुछ भाज करने आया हूँ, मगर हिम्मत नहीं पड़ती। अभी पिछला ही पड़ा हुआ है, अब और किस मुँह से मांगूं ? लेकिन अल्लाह जानता है, कहीं से एक पैसा मिलने की उम्मीद नहीं, और काम ऐसा आ पड़ा है कि अगर न • फरूँ, तो जिन्दगीभर पछतावा रहेगा। आपसे कुछ कह नहीं सकता। भागे आप यालिक हैं। यह समझकर क्षोजिए कि कुएं में डाल रहा हूँ। जिंदा रहूँगा, तो एक- एक कौमी भय सूद के अदा कर दूंगा। मगर इस घड़ी नाही न कीजिएगा। दाऊ.-तीन सौ तो हो गये। दो सौ फिर मांगते हो। दो साल में कोई-सात -सौ रुपये हो जायेंगे । इसको खार है या नहीं ? रहमान--गरीबंपरवर । अल्लाह दे तो दो बीघे ऊख में पांच सौ आ सकते हैं। अल्लाह ने चाहा, तो मियाद के अन्दर मापकी कौड़ी-कौड़ी अदा कर दूंगा। दाऊदयाल ने दो सौ रुपये फिर दे दिये। जो लोग उनके व्यवहार से परिचित 'थे, उन्हें उनकी इस रिआयत पर आश्चर्य होता था। ( ४ ) खेतो की हालत अनाथ बालक की-सी है । जल और वायु अनुकूल हुए तो नाज के ढेर लग गये । इनकी कृपा न हुई, तो लहलहाते हुए खेत कपटी मित्र की भांति दगा दे गये । भोला और पाला, सूखा और बाढ़, रिड्डी और लाही, दोमक और आंधी से प्राण बचे, तो फसल खलियान में भाई । और खलियान से आग और विजलो दोनों ही को पैर है। इतने दुश्मन से पची, तो फसल, नहीं तो मसला ! रहमान ने फलेजा तोड़कर मेहनत की । दिन को दिन और रात को रात न समझा । बीवो और बच्चे दिलोजान से लिपट गये। ऐसी ऊख लगी कि हाथी घुसे, तो समा जाय । पारा गाँव दतिो उँगली दबाता था। लोग रहमान से कहते-यार, अबकी तुम्हारे पौ-बाहर हैं। हारे दर्जे सात सौ कहीं नहीं गये। अबकी बेड़ा पार है। रहमान सोचा करता,