पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१७२

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मुक्तिधन १७१ . देंगे। एक बार उनके पास जाकर देखें तो सहो, कौन जाने, मेरी विपत्ति का हाल सुनकर उन्हें दया आ जाय । बड़े आदमी हैं, कृपा-दृष्टि हो गई, तो सौ-दो सो उनके लिए कौन बड़ी बात है। इस भौति मन में सोच विचार करता हुआ वह लाला दाऊदयाल के पास चला । रास्ते में एक-एक कदम मुश्किल से उठता था। कौन मुँह लेकर जाऊं। अभी तीन हौ दिन हुए हैं, साल भर में पिछले रुपये अदा करने का वादा करके आया हूँ। पर जो २००) और माँगूगा, तो वह क्या कहेंगे। मैं हो उनकी गह पर होता, तो कभी न देता । उन्हें अक्षर सन्देह होगा कि यह आदमो नीयत का बुरा है । कहीं दुत्कार दिया, घुड़कियां दो यो ? पूर्छ, तेरे पास ऐसो कोन-सो जायदाद है, जिस पर रुपये को थलो दे दूं, तो क्या जवाब दूंगा ? जो कुछ आयमाद है, वह यही दोनों हाथ हैं। इसके सिवा यहाँ क्या है ! घर को कोई संत भी न पूछेगा। खेत हैं, सो जमींदार के, उन पर अपना कोई काबू हो नहीं । बेकार जा रहा हूँ। वहाँ धक्के खाकर निकलना पड़ेगा, रही-सही आबरू भी मिट्टी में मिल जायगी। परन्तु इन निराशजनक शकाओं के होने पर भी वह धोरे-धीरे आगे बढ़ा चला जाता था, जैसे कोई अनाथ विधवा थाने में फरियाद करने जा रही हो । लाला दाऊदयाल चहरो से आकर अपने स्वभाव के अनुसार नौकरों पर विगह रहे थे-द्वार पर पानी क्यों नहीं लिहला, बरामदे में कुरसियां क्यों नहीं निकाल रखों ? इतने में रहमान सामने जाकर खड़ा हो गया । लाला साहब मल्लाये तो बैठे हो पे, रुष्ट होकर बोले-तुम क्या करने आये हो जी! क्यों मेरे पीछे पड़े हो ? मुझे इस वक्त बातचीत करने की फुरसत नहीं है। रहमान कुछ न बोल सका । यह डॉट सुनकर इतना हताश हुआ कि उलटे पैरों लौट पड़ा। हुई न वही बात ! यही सुनने तो मैं आया था। मेरी भाल पर पत्थर पर गये थे। दाऊदपाल को कुछ दया आ गई । जब रहमान मरामदे से नीचे उतर गया, तो बुलाया, जरा नर्म होकर बोले - कैसे आये थे लो, क्या कुछ काम पा ? रहमान-नहीं सरकार, यों ही सलाम करने चला आया था। दाम.-एक कहावत है-'सलामे रोस्ताई वेगानेस्त'-किसान विना मत- लय के सलाम नहीं करता। क्या सतळा है, कहो । ,