पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१८३

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तीसरा-- वाह रे धर्मात्मा ! क्यों न हो, आप बड़े धर्मात्मा है। जरा आपकी दुम देखू ? क्या धर्मात्मा आदमियों के दुम होती है चौथा--और क्या, किसी के एक हाथ की, किसी के दो हाथ की, आप हैं . किस फेर में ? दुमदारों के सिवा भाय धर्मात्मा है हो कौन ? हम सब पापात्मा तीसरा-धर्मात्मा वकील, ओ हो, धर्मात्मा वेश्या, ओ हो। दसरा-धार्मिक आपत्ति तो आपछो हो ही नहीं सकती। वकील होना धार्मिक विचारों से शून्य होने का चिह है। मैं-भाई, मुझे सूट नहीं करती ? तीसरा- अन मार लिया, सूजी को मार लिया, आपको सूट नहीं करती ? मैं सूट करा दूं? दूसरा- क्या दिसो डाक्टर ने मना किया है ? मैं-नहीं। तीसरा- वाह वाह ! आप खुद ही ढास्टर णन गये। अमृत आपको सूट नहीं करता ! अरे धर्मात्माजी, एक बार पीके देखिए । दसरा-पुळे आपके मुंह से यह सुनकर आश्चर्य हुआ। भाजी, यह क्या है, महौषधि है, यही सोम-रस है। कहीं आपने टेंपरेंस की प्रतिज्ञा तो नहीं ले ली है ? मैं-मान लीजिए, ली हो, तो तीसरा-तो आप बुद्धू है, सोधे-साधे कोरे सुधू । चौथा- जाम चलने को है सब, अहले-नजर बैठे हैं। आँख साकी न चुराना, हम इधर बैठे हैं। दूसरा हम सभी टॅपरेस के प्रतिज्ञाधारी हैं, पर जब वह इम ही नहीं रहे, तो वह प्रतिमा कहाँ रही ? हमारें नाम वही है, पर हम वह नहीं है, जहाँ लकपन की और बातें गई, वहीं बह प्रतिज्ञा भी गई। मैं- आखिर इससे फायदा क्या है ? इसरा- यह तो पीने ही से मालूम हो सकता है। एक प्याली पीजिए, फायदा न मालूम हो, तो फिर न पीजिएगा। ,