पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२१

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1 ७ है वह सोच रहे थे, इसने मेरे साथ ऐसी दगा की ! मैंने इसके लिए क्या कुछ न किया। इसकी कौन-सी इच्छा थी, जो मैंने पूरी नहीं की, और इसी ने मुझसे बेव- फ्राई को ! नहीं, कभी नहीं, मैं इसके बगैर जिन्दा नहीं रह सकता। दुनिया चाहे' मुझे बदनाम करे, हत्यारा कहे, चाहे मुझे पद से हाथ धोना पड़े, लेकिन आपटे को न छोडूंगा । इस रोड़े को रास्ते से हटा दूंगा, इस कांटे को पहलू से निकाल बाहर करूंगा। सहसा कमरे का द्वार खुला और मिस जोशी ने प्रवेश छिया। मिस्टर जौहरी हकमकाकर कुरसी पर से उठ खड़े हुए और यह सोचकर कि शायद मिस जोशी उधर से निराश होकर मेरे पास आई है, कुछ रूखे, लेकिन नम्रभाव से बोले-आओ वाला, तुम्हारी ही याद में बैठा था। तुम कितनी ही बेवफ़ाई करो, पर तुम्हारी याद मेरे दिल से नहीं निकल सकती। मिस जोशी-आप केवल जपान से कहते हैं। मिस्टर जौहरो-क्या दिल चीरकर दिखा दूँ? मिस जोशी-रेम प्रतिकार नहीं करता, प्रेम से दुराग्रह नहीं हेता। आप मेरे' खून के प्यासे हो रहे हैं, उस पर भी आप कहते हैं, मैं तुम्हारी याद करता हूँ। आपने मेरे स्वामी को हिरासत में डाल रखा है, यह प्रेम है। आखिर आप मुझसे क्या चाहते हैं? अगर आप समझ रहे हो कि इन सख्तियों से डरकर मैं आपकी शरण आ जाऊँगी, तो आपका भ्रम है। आपको अख्तियार है कि आपटे को काले पानी भेज' दें, फांसी पर चढ़ा दें, लेकिन इसका मुझ पर कोई असर न होगा। वह मेरे स्वामी हैं, मैं उनको अपना स्वामी समझती हूँ। उन्होंने अपनी विशाल उदारता से मेरा उद्धार किया । आप मुझे विषय के फन्दों में फंसाते थे, मेरी आत्मा को कलुषित करते थे । कभी आपको यह खयाल आया कि इसकी आत्मा पर क्या बीत रही होगी? आप मुझे भात्म शून्य समझते थे। इस देव-पुरुष ने अपनी निर्मल, स्वच्छ आत्मा के आकर्षण से मुझे पहली ही मुलाकात में खींच लिया। मैं उसकी हो गई और मरते दम तक उसी को रहूंगी। उस मार्ग से अब आप मुझे नहीं हटा सकते । मुझे एक सच्ची आत्मा को जरूरत थी। वह मुझे मिल गई। उसे पाकर अब तीनों लोक को सम्पदा मेरी आँखों में तुच्छ है । मैं उनके वियोग में चाहे प्राण दे दें, पर आपके काम नहीं मा सकती। . .