पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२३६

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मुक्ति मार्ग २३५ . कि अपने नराबर किसी को समझे हो नहीं । उसको डोग सुनता है, तो बदन में आग लग जातो है। कल का बानो आज का सेठ । चला है हमी से कड़ने । अभो कल लँगोटी लगाये खेतों में कौए हंकाया करता था, आज उसका आसमान में दिया अलता है हरिहर-कहो, तो कुछ उताजोग करूँ झींगुर-क्या करोगे ! इसी डर से तो वह गाय-भैस नहीं पालता। हरिहर-भेड़े तो हैं ? मोगुर-क्या, बगला मारे पखना हाथ । हरिहर-फिर तुम्ही सोचो। झींगुर-ऐसी जुगुत निकालो कि फिर पनपने न पावे । इसके बाद फुस-फुस करके बातें होने लगी। यह एक रहस्य है कि भलाइयों में जितना द्वेष होता है, बुराइयों में उतना हो प्रेम । विद्वान् विद्वान् को देखकर, साधु साधु को देखकर और कवि कवि को देखकर जलता है। एक दूसरे की सूरत नहीं देखना चाहता। पर जुआरो जुभारो को देखकर, शरावो शरामो को देखकर, चोर चौर को देखकर सहानभूति दिखाता है, सहायता करता है। एक पण्डितजी मगर अंधेरे में ठोपर खाकर गिर पड़े, तो दूसरे पण्डितजी उन्हें उठाने के बदले दो ठोकरें और लगावेगे कि वह फिर उठ हो न सके। पर एक चौर पर आफत आई देव दुसरा चोर उसको आठकर लेता है। बुराई से सब घृणा करते हैं, इसलिए घुरों में परस्पर प्रेम होता है। भलाई की सारा ससार प्रशसा करता है, इसलिए भदों में विरोध होता है। चोर को मारकर चोर क्या पावेगा? घृणा ! विद्वान् का अपमान करके. विद्वान् क्या पावेगा ? यश । मोगुर और हरिहर ने सलाह कर लो। षड्यन्त्र रचने की विधि सोचो गई। उसका स्वरूप, समय और कम ठोक किया गया। मंगुर चला, तो अकड़ा जाता था। मार लिया दुश्मन को, अब कहाँ जाता है। दूसरे दिन मोगुए काम पर जाने लगा, तो पहले बुद्धू के घर पहुंचा। वुद्धू ने पूछा-क्यों, आज नही गये क्या ? मीगुर-जा तो रहा हूँ। तुमसे यही कहने आया था कि मेरी बछिया को