पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२४८

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टिको के रुपये इन लेखों ने राजनीतिक क्षेत्र में हलचल मचा दी। पन्न-सम्पादकों को अधि- कारियों पर निशाने लगाने के ऐसे अवसर सौभाग्य से मिलते हैं। जगह-जगह - शासन की इस करतूत को निन्दा करने के लिए सभाएं होने लगी। कई सदस्यों ने व्यवस्थापक सभा में इस विषय पर प्रश्न बरने की घोषणा की। शासकों को कभी ऐसो मुँह को न खानी पड़ी थी। आखिर उन्हें अपनो मान-रक्षा के लिए इसके सिवा और कोई उपाय न सूझा कि वे मिरक्षा नईम को कैलास पर बाल-हानिया अभियोग चलाने के लिए विवश करें। 2 कैलास पर इस्तगाया दायर हुआ । हिजा नईस की ओर से सरकार पैरवी' करती थी। कैलास स्वय अपनी पैरवी कर रहा था। न्याय के प्रमुख सरक्षों ( वकील वैरिस्टरों) ने किसी अज्ञात कारण से उखळी पैरवी करना अस्वीकार किया। न्यायाधीश को हारकर कैलास को, कानून की सनद न रखते हुए गो, अपने मुकद्दमे की पैरवी करने की आज्ञा देनी पड़ी। महीनों अभियोग चलता रहा। बनता में सनसनी फैल गई। रोज हजारों आदमी बात में एकम होते थे। हालारों में अभियोग की रिपोर्ट पढ़ने के लिए समाचार-पनों को शूट होतो भो। चतुर पाठक पढ़े हुए पत्रों से घड़ी रात जाते-जाते दुगने पैसे खड़े कर लेजे थे, क्योंकि उस समय तक पत्र विक्रेताओं के पास कोई पत्र न घबने पाता था। मिन बातों का ज्ञान पहले गिने-गिनाये पत्र ग्राहकों को था, उन पर भव जनता को हिरणियां होने लगी। नईम को मिट्टी कभी इतनी खराप न हुई थी, गलो-गलो, भर-घर, उसी को चर्चा. थी। जनता का क्रोध उसी पर लेन्द्रित हो गया था। वह दिन भो स्मरणोय रहेगा, जप दोनों सच्चे, एक दूसरे पर प्राण देनेवाले लिभ अदालत में आमने-सामने खड़े, हुए, और कैलास ने मिरजा नईम से जिरह करनी शुरु को। कैलास को ऐसा मानसिक कष्ट हो रहा था, मानों वह नईम को गरदन पर तलवार चलाने जा रहा है। और नईम के लिए तो वह अग्नि परीक्षा पी। दोनों के सुख उदास थे; एक का आत्मग्लानि से, एसरे का भय से । नईम प्रमज बनने की चेष्टा करता था, कभी- कभी सूखो हँसी भी हप्तता था; लेकिन कैलाश-आह, उस गरीष के दिल पर जो गुजर रही थी, उसे कौन जान सकता है। कैलास ने पूछा-आप और मैं साथ पढ़ते थे, इसे आप स्वीकार करते हैं । . -