पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२५८

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शतरज के खिलाफी २५७ धरे रहें, और मात हो जाय । पर जाइए, सुन आइए। क्यों खामख्वाह उनका दिल दुखाइएगा? मिरजा इसी बात पर मात हो करके जाऊँगा। मोर-मैं खेलं गा ही नहीं। आप जाकर सुन आइए । मिरजा-अरे यार, जाना पड़ेगा हकीम के यहाँ । सिर-दर्द खाक नहीं है । मुझे परेशान करने का पहाना है। मौर-कुछ ही हो, उनको खातिर तो करनी ही पड़ेगी। मिरजा- अच्छा, एक चाल और चल लूँ मोर-हरगिज नहीं, जब तक आप सुन न आवंगे, मैं मुहरे में हाथ हो न . लगाऊँगा। मिरजा साहष मजबूर होकर अन्दर गये, तो बेगम साहना ने त्यौरियां बदलकर, लेकिन कराहते हुए, कहा--तुम्हें निगोडो शतरंज इतनी प्यारो है । चाहे कोई मर हो जाय, पर उठने का नाम नहीं लेते ! नौज कोई तुम जैसा आदमी हो। मिरजा-क्या कहूँ, मर साइप मानते हो न.थे। वो मुश्किल से पीछा छुड़ा- कर आया हूँ। बेगम- क्या जैसे वह खुद निखटू है, वैसे हो सबको समझते हैं ? उनके भी तो पाळ-बच्चे है ; या सषका सफाया कर डाला ? मिरजा-बड़ा लतो आदमी है । जम आ जाता है, तब मजबूर होकर मुझे भो खेलना ही पड़ता है। बेगम-दुत्कार क्यों नहीं देते ? मिरजा |-बराबर के आदमो हैं , उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अगुल ऊँचे । मुलाहिजा करना हो पढ़ता है। बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देतो हूँ । नारान हो जायेंगे, हो जायें। कौन किसो की रोठियां चला देता है । रानी रुठेगो, भपना सुहाग लेंगो।-हिरिया, जापाहर से शतरंज उठा ला। मोरसाहय से कहना, मियाँ अब न खेलेंगे, आप तशरोम ले जाइए। मिरना-हाँ हाँ, कहीं ऐसा प्रजा भो न करना । प्रलोल कराना चाहती हो क्या ? ठहर हिरिया कहा जाती है। . १.