पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२९८

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भाडेका टट्टू २९७ दोनों मित्रों में कितना अन्तर था! एक कितना उदार था। दसरा कितना स्वार्थी | रमेश चाहता, तो भरी अदालत में उन रात की बात कह देता । लेकिन यश- -चंत जानता था, रमेश फांसी से बचने के लिए भी उस प्रमाण का आश्रय न लेगा, जिसे मैं पुप्त रखना चाहता हूँ। जब तक सुकदमे की पेशियाँ होती रहों, तब तक यशवंत को अवह्य मर्म- वेदना होती रही। उसकी आत्मा और स्वार्थ में नित्य सग्राम होता रहता था, पर फैसले के दिन तो उसकी वही दशा हो रही थी जो किसो खून के अपराधो को हो। इजलास पर लाने की हिम्मत न पाती थी। वह तीन बजे कचहरी पहुचा । मुलजिम अपना भाग्य-निर्णय सुनने को तैयार खड़े थे । रमेश भी माज रोज़ से ज्यादा उदास था। उसके जीवन-संग्राम में वह अवसर आ गया था, जब उसका सिर तलवार को धार के नीचे होगा। अब तक भय सूक्ष्म रूप में था, आज उसने स्थूल रूप धारण कर लिया था। यशवंत ने दृढ़ स्वर में फैसला सुनाया ! जब उसके मुख से ये शब्द निकले कि रमेशचद्र को ७ वर्ष कठिन करावाच, तो उसका गला रुंध गया। उसने तनवोज़ मेज पर रख दी। कुर्सी पर बैठकर पसीना पाउने के बहाने आँखा में उमड़े हुए आँसुओ को पोछा । इसके आगे तमोज उससे न पढ़ी गई । रमेश जेल से निकलकर पक्का क्रान्तिमादो बन गया। जेल को अंधेरी कोठरी में दिन-भर के कठिन परिश्रम के बाद वह दोनो के उपकार और सुधार के मसूचे बांधा करता था । सोचता, मनुष्य श्यों पाप करता है ? इसीलिए न कि संपार में इतनो विषाता है। कोई तो विशाल भवन में रहता है, और किसी को पेड़ को छोह भो मयस्सर नहीं । कोई रेशम और रत्नों से मढ़ा हुआ है, किसी को फटा पत्र भी नहीं। ऐसे न्याय-विहीन संसार में यदि चोरी, हत्या और अधर्म है तो यह किपका दोष है ? बह एक ऐसो समिति खोकने का स्वप्न देखा करता, जिसका काम संसार से इस विष- भता को मिटा देना हो । संसार सपके लिए है, भोर उपमें सपको सुख भोगने का समान अधिधार है। न डाका डाला है, न चोरी चोरो। धनो अगर आना धन खुशो से नहीं वोट देता, तो उसको इच्छा के विरुद्ध बांट लेने में क्या पाप धनो उसे पाप कहता है, तो कहे । उसका बनाया हुआ कानून आर दड देना च हता है, तो दे ।