पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/३१४

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विनाद 1 । अकड़कर चलते हुए आकर क्लास में बैठ गये। घोड़ी देर के बाद लूसी भी आई । पण्डित का यह वेष देखा, तो चकित हो गई। उसके अधरों पर मुसकान को एक अपूर्व रेखा अकित हो गई। पण्डितजी ने समझा, यह उसके उल्लासं का चिह्न है । बार-बार मुस्किराकर उसकी ओर ताकने और रहस्य-पूर्ण भाव से देखने लगे। किन्तु वह लेश मात्र भी ध्यान न देती थी। पण्डितभी की जीवन-चर्या, धर्मोत्साह और जातीय प्रेम में बड़े वेग से परिवर्तन होने लगे। सबसे पहले शिखा पर छुरा फिरा । अंगरेज़ी फैशन के बाल कटवाये गये। लोगों ने कहा-यह क्या महाशय । आप तो फरमाते थे कि शिखा द्वारा विद्यु प्रमाह शरीर में प्रवेश करता है। अब वह किस मार्ग से जायगा ? पण्डितजी ने दार्शनिक भाव से मुस्किराकर कहा-मैं तुम लोगों को उल्लू बनाता था। क्या मैं इतना भी नहीं जानता कि यह सब पाखड है । मुछे अन्तःकरण से इस पर विश्वास हो का था ; आप लोगों को चकमा देना चाहता था। नईम-वल्लाह, आप एक ही झांसेपाल निकले। हम लोग आपको बछिया के ताऊ ही समझते थे, मगर माप तो आठो गांठ कुम्मत निकले ? चक्रपर-देखता था कि लोग कहते क्या हैं। शिखा के साथ साथ संध्या और हवन को भी इतिश्री हो गई। हवन-कुण्ड कमरे में चारपाई के नीचे फेंक दिया गया। कुछ दिनों के बाद सिगरेट के जले हुए टुकड़े रखने का काम देने लगा। जिस आसन पर बैठकर हवन किया करते थे, वह पायदान बना । अब प्रति दिन साबुन रगड़ते, पालों में को करते और सिगार पीते । यार लोग उन्हें चग पर चढाते रहते थे। यह प्रस्ताव हुआ कि इस चडूल से वास्कट के रुपये वसूल करने चाहिए मय सूद के । फिर क्या था, लूसो का एक पत्र आ गया-आपके रुपातर से मुझे जितना भानद हुआ, उसे शब्दों में नहीं प्रकट कर सकती। आपसे मुझे ऐसी ही आशा थो । अब भाप इस योग्य हो गये हैं कि कोई यूरोपियन लेडी आपके सहवास में अपना अपमान नहीं समझ सकती। अब आपसे प्रार्थना केवळ यहो है कि मुझे अपने अनत और अविरल प्रेम का कोई चिह्न प्रदान कीजिए, जिसे मैं सदैव अपने पास रखू । मैं कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं, केवल प्रेमोपहार चाहती हूँ।' चक्रधर ने मित्रों से पूछा -~-अपनी पत्नी के लिए कुछ सौगात भेजना चाहता हूँ। च्या भेजना उचित होगा।