पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/३१९

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Increji • मानसरोवर मानारजन के लिए थे। पढ़ना पढ़ाना तो उनका था 'नहीं, थामाद प्रमाद ही में समय व्यतीत पिया करते थे ; कवि-सम्मेलन को भी ठहरी ।' कविजनों के नाम बुलावे भेजे गये । सारांश यह कि एड़े पैमाने पर प्रीतिभोज का प्रबन्ध किया गया, और भाज हुआ भी दिराट् । विद्यालय के नौकरों ने पूरियां बेचों । विद्यालय के इतिहास में वह भाज चिरस्मरणीय रहेगा। मित्रों ने खूब बढ़-बदर हाथ मारे। दा-दीन मिसे भी खाँच बुलाई गई । मिरपा नईल लूसो को धेर घारकर ले ही 'आये । इसने भाज का और भी रसमय बना दिया। । - किंतु शोल, महाशोक, इस भेज का परिणाम अभागे चक्रवर के लिए कल्याण मारी न हुआ । चलते-चलते लज्जित और अपमानित हे ना बदा था। मित्रों की तो दिल्लगी थी, और उस बेचारे की जान पर बन रही थी। सोचे, अब तो मिदा होते हो है, फिर मुलाकात हो या न हो । अब जिस दिन के लिए सब करें ? मन के प्रेमी- द्गारो हा निकाल क्यो न लें। कलेजा चीरकर दिखा क्या न दें। और लोग तो दावत खाने में जुटे हुए थे, धौर बह मदनवाण-पीड़ित युवक बैठा सोच रहा था कि यह अभिलाषा क्यांवर पूरी हो जल यह आत्मदमन क्यों ? लज्ना क्यों ? विरक्ति क्यो ? गुप्त रोदन क्या ? मौन-सुखापेक्षा क्या ? अन्तदना क्या ? बैठे बैठे प्रेम को क्रिया-शील बनाने के लिए मन में वल का सचार करते रहे, कभी देवते का स्मरण करते, कभी ईश्वर को अपनी भक्ति की याद दिलाते । अबसर की ताक इस भौति बैठे थे, जैसे छाला मेढक की ताक में वैटता है। भोज समाप्त हो गया। पान- इलायची बॅट चुकी, वियोग-वार्ता हो चुकी । लिस लूसी अपनी श्रवणमधुर बाणो से हृदयों में हाहाकार मचा चुकी और भाजगाला से निकलकर बाइसिकिल पर बैंठी । उधर कवि सम्मेलन में इस तरह का मिसरा पढ़ा गया कोई दीवाना बनाये, कोई दीवाना बने । इधर चक्रधर चुपके से लूसी के पीछे हो लिये, और साइकिल को भयकर वेग से दौड़ाते हुए उसे आधे रास्ते में जा पकड़ा। वह इन्हें इस व्यग्रता से दौड़े आते देख- कर सहम उठो कि कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई। बोली-वेल पण्डितजी ! क्या बात है ? आप इतने बदहवास क्यों है ? कुशल तो है चक्रधर का गला गए आया। कपित स्वर से बोले--अम आपसे सदैव के लिए -