सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/११

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
मन्दिर

वह तो दयामय भगवान् हैं, दोनों की रक्षा करते हैं, क्या मुझ पर दया न करते 2.यह सोचकर सुखिया का मन अधीर हो उठा। नहीं, अब विलम्ब करने का समय न था । वह अवश्य जायगी और ठाकुरजी के चरणों पर गिरकर रोयेगी। उस अबलाके आशकित हृदय को अव इसके सिवा और कोई अवलम्व, कोई आश्रय न था । मन्दिर के द्वार बन्द होंगे, तो वह ताले को तोड़ डालेगी। ठाकुरजी क्या किसी के हाथों विक गये हैं कि कोई उन्हें बन्द कर रखे।

   रात के तीन बज गये थे। सुखिया ने बालक को कम्मलसेढांपकर गोद में उठाया, एक हाथ में थाली उठाई और मन्दिर की ओर चली। घर से बाहर निकलते

ही शीतल वायु के झोंकों से उसका कलेजा काँपने लगा। शीत सेपाँव शिथिल हुए जाते थे। उस पर चारों ओर अन्धकार छाया हुआ था। रास्ता दो फरलाँग से कम न था। पगडण्डी वृक्षो के नीचे-नीचे गई थी। कुछ दूर दाहिनी ओर एक पोखरा था,कुछ दूर वाँस की कोठियाँ । पोखरे में एक धोबी मर गया था और बाँस की कोठियो में चुडैलों का अड्डा था । वाई ओर हरे-भरे खेत थे। चारों ओर सन-सन हो रहा था, अन्धकार सायॉं-सायँ कर रहा था। सहसा गोदड़ों ने कर्कश स्वर से हुआं-हुआं करना शुरू किया। हाय ! अगर कोई उसे एक लाख रुपये देता, तो भी इस समय वह यहाँ न आती; पर बालक को ममता सारी शंकाओं को दबाये हुए थी। 'हे भगवान् ! अब तुम्हारा ही आसरा है ।' यही जपती वह मन्दिर की ओर चली जा रही थी।

        मन्दिर के द्वार पर पहुँचकर मुखिया ने जजीर टटोलकर देखी। ताला पड़ा हुआ था। पुजारीजी बरामदे से मिली हुई कोठरी में किवाड़ बन्द किये सो रहे थे। चारो

ओर अंधेरा छाया हुआ था। सुखिया चबूतरे के नीचे से एक इंट उठा लाई और जोर-जोर से ताले पर पटकने लगी। उसके हाथों में न जाने इतनी शक्ति कहाँ से आ गई थी। दो ही तीन चोटों में ताला और इंट दोनों टूटकर चौखट पर गिर पड़े। सुखिया ने द्वार खोल दिया और अन्दर जाना ही चाहती थी कि पुजारी किवाड़ खोलकर हड़बड़ाये हुए बाहर निकल आये और 'चोर, चोर।' का गुल मचाते गांव की और दौड़े। जाड़ों में प्राय.पहर रात रहे ही लोगों की नींद खुल जाती है। यह शोर सुनते ही कई आदमी इधर-उधर से लालटेने लिये हुए निकल पड़े और पूछने लगे—कहां है,कहां है ? किधर गया ? >