पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१२

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मानसरोवर पुजारी-मन्दिर का द्वार खुला पड़ा है। मैंने खट-खट की आवाज़ सुनी। सहसा सुखिया बरामदे से निकलकर चबूतरे पर आई और बोली-चोर नहीं है, मैं हूँ.; ठाकुरजी की पूजा करने आई थी। अभी तो अन्दर गई भी नहीं। मार हल्ला मचा दिया। पुजारी ने कहा-अब अनर्थ हो गया। सुखिया मन्दिर में जाकर ठाकुरजी को भ्रष्ट कर आई। फिर क्या था, कई आदमी झल्लाये हुए लपके और सुखिया पर लातों और चूँ सों की मार पड़ने लगी। सुखिया एक हाथ से बच्चे को पकड़े हुए थी और दूसरे हाथ से उसकी रक्षा कर रही थी। एकाएक एक वलिष्ट ठाकुर ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि बालक उसके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ा , मगर वह न रोया, न बोला, न साँस ली । सुखिया भी गिर पड़ी थी। सँभलकर वच्चे को उठाने लगी, तो उसके मुख पर नजर पड़ी । ऐसा जान पड़ा, मानो पानी में परछाई हो । उसके मुंह से एक चीख निकल गई । बच्चे का माथा छूकर देखा। सारी देह ठण्डी हो गई थी। एक लम्बी साँस खींचकर वह उठ खड़ी हुई । उसकी आँखों में आँसू न आये । उसका मुख क्रोध की ज्वाला से तमतमा उठा, आँखों से अगारे वरसने लगे। दोनों मुट्टियाँ वॅध गई । दाँत पीसकर बोली-पापियो, मेरे बच्चे के प्राण लेकर अब दूर क्यों खड़े हो ? मुझे भी क्यों नहीं उसी के साथ मार डालते 2 मेरे छू लेने से ठाकुरजी को छूत लग गई। पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है, पारस लोहा नहीं हो जाता । मेरे छूने से ठाकुरजी अपवित्र हो जायँगे ! मुझे बनाया तो छूत नहीं लगी ? लो, अब कभी ठाकुरजी को छूने नहीं आऊँगी । ताले में वन्द करके रखो, पहरा बैठा दो। हाय, तुम्हें दया छू भी नहीं गई ! तुम इतने कठोर हो ! बाल-बच्चे- वाले होकर भी तुम्हें एक अभागिनी माता पर दया न आई ! तिस पर धरम के ठेकेदार बनते हो! तुम सब-के-सव हत्यारे हो, निपट हत्यारे हो । डरो मत, मैं थाना-पुलिस नहीं जाऊँगी, मेरा न्याय भगवान् करेंगे, अव उन्हीं के दरबार में फरियाद करूँगी। किसी ने चूँ न की, कोई मिनमिनाया तक नहीं । पाषाण-मूर्तियों की भांति सब-के-सव सिर झुकाये खड़े रहे। इतनी देर में सारा गाँव जमा हो गया था। सुखिया ने एक बार फिर बालक 1