पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१११

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चोरी १०७ - दोपहर से छुट्टी हो जायगी। मौलवी साहब मेले मे बुलबुल लड़ाने जायेंगे। यह खवर सुनते ही हमारी खुशी का ठिकाना न रहा, वारह आने तो बैंक मे जमा ही कर चुके थे, साढे तीन आने मे मेला देखने की ठहरी । खूब वहार रहेगी। मजे से रेवड़ियां खायेंगे, गोलगप्पे उड़ायेंगे, झूले पर चढ़ेगे, और शाम को घर पहुंचेंगे, लेकिन मोलवी साहब ने एक कड़ी गर्त यह लगा दी थी कि सब लड़के छुट्टी के पहले अपना-अपना सबक सुना दें, जो सवक न सुना सकेगा, उसे छुट्टी न मिलेगी। नतीजा यह हुआ कि मुझे तो छुट्टी मिल गई, पर हलधर कैद कर लिये गये। और कई लड़कों ने भी सबक सुना दिये थे। वे सभी मेला देखने चल पड़े। मैं भी उनके साथ हो लिया। पैसे मेरे ही पास थे, इसलिए मैंने हलधर को साथ लेने का इतज़ार न किया। तय हो गया था कि वह छुट्टी पाते ही मेले आ जायें, और दोनों साथ-साथ मेला देखें। मैंने वचन दिया था कि जब तक वह न आयेंगे, एक पैसा भी न खर्च करूँगा, लेकिन क्या मालूम था कि दुर्भाग्य कुछ और ही लीला रच रहा है। मुझे मेला पहुँचे एक घटे से ज़्यादा गुजर गया, पर हलधर का कहीं पता नहीं। क्या अभी तक मौलवी साहब ने छुट्टी नहीं दी, या रास्ता भूल गये ? आँखें फाड़-फाड़कर सड़क की ओर देखता था। अकेले मेला देखने में जी भी न लगता था। यह सशय भी हो रहा था कि कहीं चोरी खुल तो नहीं गई, और चचाजी हलधर को पकड़कर घर तो नहीं ले गये । आखिर जव शाम हो गई, तो मैंने कुछ रेवड़ियाँ खाई , और हलधर के हिस्से के पैसे जेव में रखकर धीरे-धीरे घर चला। रास्ते में खयाल आया, मकतब होता चलूँ । शायद हलधर अभी वहीं हो, मगर वहाँ सन्नाटा था। हाँ, एक लड़का खेलता हुआ मिला। उसने मुझे देखते ही ज़ोर से कहकहा मारा और बोला- बचा घर जाओ तो, कैसी मार पड़ती है। तुम्हारे चचा आये थे। हलवर को मारते- मारते ले गये हैं। अजी ऐसा तानकर घूसा मारा कि मियाँ हलधर मुंह के बल गिर पड़े। यहाँ से घसीटते ले गये हैं। तुमने मौलवी साहब की तनख्वाह दे दी थी, वह भी ले ली। अभी से कोई बहाना सोच लो, नहीं तो बेभान की पड़ेगी। मेरो सिट्टी-पिट्टी भूल गई, बदन का लहू सूख गया। वही हुआ जिसका मुझे शक हो रहा था। पैर मन-सन भर के हो गये। घर की ओर एक-एक कदम चलना मुश्किल हो गया। देवी-देवताओं के जितने नाम याद थे, सभी की मानता मानी- किसी को लड्डू, किसी को पेड़े, किसी को बतासे । गाँव के पास पहुंचा, तो गांव के