पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/११३

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चोरी १०९ जमा हो जाते , और घण्टों दवा पीते रहते थे , मुश्किल से खाना खाने उठते थे। इस समय भी वह दवा पी रहे थे। रोगियों की मडली जमा थी, मुझे देखते ही पिताजी ने लाल आँखें करके पूछा-कहाँ थे अब तक ? मैंने दवी ज़बान से कहा - कहीं तो नहीं । 'अव चोरी की आदत सीख रहा है ! वोल, तूने रुपया चुराया कि नहों ?' मेरी जवान बन्द हो गई । सासने नगी तलवार नाच रही थी। शब्द भी निक- लते हुए डरता था। पिताजी ने ज़ोर से डौटकर पूछा-बोलता क्यों नहीं , तूने रुपया चुराया' कि नहीं? मैंने जान पर खेलकर कहा - मैंने कहाँ मुँह से पूरी बात न निकलने पाई थी कि पिताजी विकराल रूप धारण किये, दाँत पीसते, झपटकर उठे और हाथ उठाये मेरो ओर चले। मैं जोर से चिल्लाकर रोने लगा--ऐसा चिल्लाया कि पिताजी भी सहम गये । उनका हाथ उठा ही रह गया। शायद समझे कि जब अभी से इसका यह हाल है, तब तमाचा पड़ जाने पर कहीं इसकी जान ही न निकल जाय। मैंने जो देखा कि मेरी हिकमत काम कर गई, तो और भी गला फाड़-फाड़कर रोने लगा। इतने में मडली के दो-तीन आदमियों ने पिताजी को पकड़ लिया, और मेरी ओर इशारा किया, भाग जा ! वच्चे बहुधा ऐसे मौके पर और भी मचल जाते हैं, और व्यर्थ मार खा जाते हैं । मैंने बुद्धिमानी से काम लिया । लेकिन अन्दर का दृश्य इससे कहीं भयकर था। मेरा तो खून सर्द हो गया। हल- धर के दोनों हाथ एक खम्भे से बंधे थे, सारी देह धूल-धूसरित हो रही थी, और वह अभी तक सिसक रहे थे । शायद वह आँगन-भर में लोटे थे। ऐसा मालूम हुआ कि सारा आँगन उनके आँसुओ से भीग गया है। चची हलधर को डांट रही थीं, और अम्मां बैठी मसाला पीस रही थीं। सबसे पहले मुझ पर चची की निगाह पड़ी। -लो, वह भी आ गया। क्यों रे, रुपया तूने चुराया था कि इसने ? मैंने निश्शक होकर कहा - हलधर ने । अम्माँ बोलीं-अगर उसी ने चुराया था, तो तूने घर आकर किसी से कहा क्यो नहीं? अव झूठ बोले बगैर वचना मुश्किल था। मैं तो सममता हूँ कि जब आदमी बोलीं- साँचा:सही