पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१४६

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१४२ मानसरोवर - - मुझे कभी प्यार न करते थे। घर में वह केवल दो बार घण्टे-घण्टे-भर के लिए भोजन करने आते थे ; बाकी सारे दिन दफ्तर में लिखा करते थे। उन्होंने बार-बार एक सहकारी के लिए अफसरों से विनय की थी ; पर इसका कुछ असर न हुआ था। यहाँ तक कि तातील के दिन भी बाबूजी दफ्तर ही में रहते थे। केवल माताजी उनका क्रोध शान्त करना जानती थीं, पर वह दफ्तर में कैसे आतीं । बेचारा कजाकी उसी वक्त मेरे देखते-देखते निकाल दिया गया । उसका बल्लम, चपरास और साफा छीन लिया गया और उसे डाकखाने से निकल जाने का नादिरी हुक्म सुना दिया गया । आह ! उस -वक्त मेरा ऐसा जी चाहता था कि मेरे पास सोने की लङ्का होती, तो कजाकी को दे देता और बाबूजी को दिखा देता कि आपके निकाल देने से कजाकी का वाल भी बांका नहीं हुआ । किसी योद्धा को अपनी तलवार पर जितना घमण्ड होता है, उतना ही घमण्ड कजाकी को अपनी चपरास पर था। जब वह चपरास खोलने लगा, तो उसके -हाथ काँप रहे थे और आँखों से आंसू बह रहे थे । और इस सारे उपद्रव को जड़ वह कोमल वस्तु थी, जो मेरी गोद में मुंह छिपाये ऐसे चैन से बैठी हुई थी, मानो माता की गोद में हो । जब कजाकी चला, तो मैं भी धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे चला । मेरे घर के द्वार पर आकर कजाकी ने कहा-भैया, अब घर जाओ , साँझ हो गई। मैं चुपचाप खड़ा अपने आँसुओं के वेग को सारी शक्ति से दवा रहा था। कजाकी फिर बोला-भैया, मैं कहीं बाहर थोड़े ही चला जाऊँगा। फिर आऊँगा और तुम्हें कन्धे पर बैठालकर कुदाऊँगा। बावूजो ने नौकरी ले ली है, तो क्या इतना भी न करने देंगे ! तुमको छोड़कर मैं कहीं न जाऊंगा, भैया ! जाकर अम्माँ से कह दो, कजाकी जाता है । उसका कहा-सुना माफ करें। मैं दौड़ा हुआ घर गया ; लेकिन अम्मांजी से कुछ कहने के बदले बिलख-बिलख- कर रोने लगा। अम्माँजी रसोई से बाहर निकलकर पूछने लगीं-क्या हुआ बेटा ? किसने मारा ? बाबूजी ने कुछ कहा है ? अच्छा, रह तो जाओ, आज घर आते हैं, तो पूछती हूँ । जब देखो, मेरे लड़के को मारा करते हैं । चुप रहो बेटा, अव तुम "उनके पास कभी मत जाना। मैंने बड़ी मुश्किल से आवाज़ सँभालकर कहा-कजाकी... अम्माँ ने समझा, कजाकी ने मारा है ; बोली-अच्छा, आने दो कजाकी को -