पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१४७

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कजाकी १४३ देखो, खड़े-खड़े निकलवा देती हूँ। हरकारा होकर मेरे राजा बेटा को मारे ! आज ही तो साफा, वल्लम, सब छिनवाये लेती हूँ। वाह ! मैंने जल्दी से कहा-नहीं, कजाकी ने नहीं मारा । वाबूजी ने उसे निकाल दिया ; उसका साफा, बल्लम छीन लिया-चपरास भी ले ली। अम्मां-यह तुम्हारे बाबूजी ने बहुत बुरा किया । वह बेचारा अपने काम में इतना चौकस रहता है। फिर उसे क्यों निकाला ? मैंने कहा-आज उसे देर हो गई थी। यह कहकर मैंने हिरन के बच्चे को गोद से उतार दिया। घर में उसके भाग जाने का भय न था। अव तक अम्माँजी की निगाह भी उस पर न पड़ी थी। उसे फुदकते देखकर वह सहसा चौंक पड़ी और लपककर मेरा हाथ पकड़ लिया कि कहीं वह भयकर जीव मुझे काट न खाय ! मैं कहाँ तो फूट-फूटकर रो रहा था और कहाँ अम्माँ- जी की घवराहट देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ा। अम्माँ-अरे, यह तो हिरन का बच्चा है ! कहाँ मिला ? मैंने हिरन के बच्चे का सारा इतिहास और उसका भीषण परिणाम आदि से अन्त तक कह सुनाया-अम्माँ, यह इतना तेज़ भागता था कि कोई दूसरा होता, तो पकड़ ही न सकता। सन्-सन्, हवा की तरह उड़ता चला जाता था। कजाकी पाँच- छ घण्टे तक इसके पीछे दौड़ता रहा । तब कहीं जाकर बचा मिले । अम्मांजी, कजा- की की तरह कोई दुनिया भर में नहीं दौड़ सकता, इसी से तो देर हो गई। इसलिए बाबूजी ने बेचारे को निकाल दिया-चपरास, साफा, वल्लम, सब छीन लिया। अब बेचारा क्या करेगा ? भूखों मर जायगा। अम्माँ ने पूछा-कहाँ है कजाकी, ज़रा उसे बुला तो लाओ। मैंने कहा-वाहर तो खड़ा है। कहता था, अम्मांजी से मेरा कहा-सुना माफ करवा देना। अब तक अम्मांजी मेरे वृत्तान्त को दिल्लगी समझ रही थीं। शायद वह समझती थी कि बाबूजी ने कजाकी को डॉटा होगा, लेकिन मेरा अन्तिम वाक्य सुनकर सशय हुआ कि सचमुच तो कजाकी घरखास्त नहीं कर दिया गया। बाहर आकर 'कजाकी। कजाकी !' पुकारने लगी ; पर कजाकी का कहीं पता न था। मैंने वारवार पुकारा ; लेकिन कजाकी वहाँ न था। ,