पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१५४

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१५० 'मानसरोवर

में घुसकर ये कमलगट्टे तोड़ लाये । तब मुझसे कहा-ले जा, भैया को दे आ । उन्हें कमलगट्टे बहुत अच्छे लगते हैं । कुसलछेम पूछती आना। मैंने पोटली से कमलगट्टे निकाल लिये थे और मजे से चख रहा था। अम्मा ने बहुत आँखें दिखाई ; मगर यहां इतना सब कहाँ ! अम्मा ने कहा-कह देना सव कुशल है। मैंने कहा-यह भी कह देना कि भैया ने बुलाया है । न जाओगे तो फिर तुमसे कभी न बोलेंगे, हाँ! बावूजी खाना खाकर निकल आये थे। तौलिये से हाथ-मुँह पोंछते हुए बोले- और भी कह देना कि साहब ने तुमको बहाल कर दिया है। जल्दी जाओ, नहीं तो कोई दूसरा आदमी रख लिया जायगा । औरत ने अपना कपड़ा उठाया और चली गई । अम्मा ने बहुत पुकारा , पर वह न रुकी । शायद अम्माँजी उसे सीधा देना चाहती थी। अम्माँ ने पूछा- सचमुच वहाल हो गया ? वाबूजी-और क्या झूठे ही बुला रहा हूँ। मैंने तो पांचवे ही दिन उसकी बहाली की रिपोर्ट की थी। अम्मा-यह तुमने बहुत अच्छा किया। बावूजी-उसकी बीमारी की यही दवा है। ( ४ ) प्रात काल मैं उठा, तो क्या देखता हूँ कि कजाकी लाठी टेकता हुआ चला आ रहा है। वह बहुत दुबला हो गया था । मालूम होता था, बूढ़ा हो गया है। हरा-भरा पेड़ सूखकर दूंठा हो गया था। मैं उसकी और दौड़ा और उसकी कमर से चिमट गया। कजाकी ने मेरे गाल चूमे और मुझे उठाकर कन्धे पर बैठालने की चेष्टा करने लगा , पर मैं न उठ सका । तब वह जानवरों की भाँति भूमि पर हाथों और घुटनों के बल खड़ा हो गया और मैं उसकी पीठ पर सवार होकर ,डाकखाने की और चला। मैं वक्त फूला न समाता था और शायद कजाकी भी मुझसे भी ज्यादा खुश था। वाबूजी ने कहा-कजाको, तुम बहाल हो गये । अब कभी देर न करना। कजाकी रोता हुआ पिताजी के पैरों पर गिर पड़ा , मगर शायद मेरे भाग्य में दोनों सुख भोगना न लिखा था-मुन्नू मिला, तो कजाकी छूटा , कजाकी आया, तो उस