पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१५५

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कजाको भात मुन्नू हाथ से गया और ऐसा गया कि आज तक उसके जाने का दुसमुन्नू मेरी ही थाली में साता था। जब तक मैं खाने न पैलूं, वह भी कुछ न खाता था । उसे से वहुत ही रुचि थी , लेकिन जब तक खूब घी न पड़ा हो, उसे सन्तोष न होता या। वह मेरे ही साथ सोता भी था और मेरे ही साथ उटता भी । सफाई तो उसे इतनी पसन्द थी कि मल-सूत्र त्याग करने के लिए घर से बाहर मैदान में निकल जाता था, कुत्तों से उसे चिढ थी, कुत्तों को घर में न घुसने देता। कुत्ते को देखते ही थाली से उठ जाता और उसे दौड़ाकर घर से बाहर निकाल देता था । कजाकी को डाकखाने में छोड़कर जब मैं खाना खाने गया, तो मुन्नू भी आ वैठा । अभी दो-चार हो कौर खाये थे कि एक बड़ा-सा झवरा कुत्ता आंगन में दिखाई दिया। मुन्नू उसे देखते ही दौड़ा। दूसरे घर में जाकर कुत्ता चूहा हो जाता है। भवरा कुत्ता उसे आते देखकर भागा । मुन्नू को अब लौट आना चाहिए था वह कुत्ता उसके लिए यमराज का दृत था । सुन्नू को उसे घर से निकालकर ही सतोष न हुआ। वह उसे घर से बाहर मैदान में भी दौड़ाने लगा। मुन्नू को शायद खयाल न रहा कि यहाँ मेरी अमलदारी नहीं है। वह उस क्षेत्र में पहुंच गया था, जहाँ झवरे का भी उतना ही अधिकार था, जितना मुन्नू का । सुन्नू कुत्तों को भगाते-भगाते कदाचित् अपने बाहुवल पर घमण्ड करने लगा था। वह यह न समझता था कि घर मे उसकी पीठ पर घर के स्वामी का भय काम किया करता है। झटरे ने इस मैदान मे आते ही उलटकर मुन्नू की गरदन दवा दी। बेचारे मुन्नू के मुँह से आवाज़ तक न निक्ली। जब पड़ोसियों ने शोर मचाया, तो मैं दौड़ा। देसा, तो मुन्नू मरा पड़ा है और भवरे का कहीं पता नहीं। मगर ।