पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१८४

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१८० मानसरोवर बुलाकी-वह तो पड़ा सो रहा है । मैंने तो समझा, तुमने काटी होगी। भोला-~-मैं तो सबेरे उठ ही नहीं पाता । दिन-भर चाहे जितना काम कर लूँ, पर रात को मुझसे नहीं उठा जाता। बुलाकी-तो क्या तुम्हारे दादा ने काटी है ? भोला- हाँ, मालूम तो होता है। रात-भर सोये नहीं। मुझसे कल बड़ी भूल हुई । अरे ! वह तो हल लेकर जा रहे हैं ? जान देने पर उतारू हो गये हैं क्या 2 बुलाकी-क्रोधी तो सदा के हैं । अब किसी की मुनेंगे थोड़े ही। भोला-गकर को जगा दो, भी जल्दी से मुंह-हाथ धोकर हल जाऊँ। जव और किसानों के साथ भोला हल लेकर खेत में पहुंचा, तो सुजान आधा खेत जोत चुके थे । भोला ने चुपके से काम करना शुरू किया । सुजान से कुछ बोलने की उसकी हिम्मत न पड़ी। दोपहर हुआ। सभी किसानों ने हल छोड़ दिये। पर सुजान भगत अपने काम .. में मग्न हैं । भोला थक गया है। उसकी वार-बार इच्छा होती है कि वैलों को खोल दे। मगर डर के मारे कुछ कह नहीं सकता। उसको आश्चर्य हो रहा है कि दादा कैसे इतनी मेहनत कर रहे हैं। आखिर डरते-डरते बोला-दादा, अब तो दोपहर हो गया । हल खोल दें न ? सुजान-हाँ, खोल दो। तुम बैलों को लेकर चलो, मैं डाँड़ फेंककर आता हूँ। भोला-मैं सझा को डांड़ फेंक दूंगा। सुजान--तुम क्या फेंक दोगे। देखते नहीं हो, खेत कटोरे की तरह गहरा हो गया है। तभी तो बीच में पानी जम जाता है । इस गोई के खेत में बीस मन का बीधा होता था। तुम लोगों ने इसका सत्यानास कर दिया। बैल खोल दिये गये। भोला वैलों को लेकर घर चला, पर सुजान डॉल फेंकते रहे । आध घटे के बाद डाँड फेककर वह घर आये । मगर थकान का नाम न था । नहा-खाकर आराम करने के बदले उन्होंने वैलों को सुहलाना शुरू किया। उनकी पीठ पर हाथ फेरा, उनके पैर मले, पूंछ सुहलाई। वैलों की पूँछे खड़ी थीं। सुजान को गोद में सिर रखे उन्हें अकथनीय सुख मिल रहा था। वहुत दिनों के बाद आज उन्हें यह आनंद प्राप्त हुआ था। उनकी आँखों में कृतज्ञता भरी हुई थी। मानो वे कह रहे थे, हम तुम्हारे साथ रात-दिन काम करने को तैयार हैं।