पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१९५

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पिसनहारी का कुआँ १९१ हरनाथ-हाँ, मैं तुम्हारे पास एक मामले में सलाह करने आया था। ज्यों ही अदर कदम रखा, वह चुडैल ताक के पास खड़ी दिखाई दी, मैं वदहवाश होकर भागा। चौधरी-अच्छा, फिर तो जाओ। स्त्री-कौन, अब तो मैं न जाने दूँ , चाहे कोई लाख रुपये दे। हरनाथ- -मैं आप न जाऊँगा। चौधरी-मगर मुझे कुछ दिखाई नहीं देता । यह बात क्या है ? हरनाथ -क्या जाने, आपसे डरती होगी। आज किसी ओझा को बुलाना चाहिए। चौधरी-कुछ समझ में नहीं आता, क्या माजरा है। क्या हुआ वैजू पौड़े की डिग्री का? हरनाथ इन दिनों चौधरी से इतना जलता था कि अपने दूकान के विषय की कोई बात उनसे न कहता था। आँगन की तरफ़ ताकता हुआ मानो हवा से वोला-जो होना होगा वह होगा, मेरी जान के सिवा और कोई क्या ले लेगा, जो खा गया है, वह तो उगल नहीं सकता। चौधरी-कहीं उसने डिग्री जारी कर दी तो? हरनाथ--तो क्या ? दूकान मे चार-वांच सौ का माल है, वह नीलाम हो जायगा। चौधरो-~कारोबार तो सब चौपट हो जायगा ? हरनाथ--अव कारबार के नाम को कहाँ तक रोऊँ अगर पहले से मालूम होता कि कुओं बनवाने की इतनी जल्दी है, तो यह काम छेड़ता ही वयों। रोटी- दाल तो पहले भी मिल जाती थी। बहुत होगा, दो-चार महीने हवालात मे रहना पड़ेगा। इसके सिवा और क्या हो सकता है ? माता ने कहा जो तुम्हे हवालात में ले जाय, उसका मुँह झुलस हूँ। हमारे जीते-जी तुम हवालात मे जाओगे ! हरनाथ ने दार्शनिक वनकर कहा--माँ-चाप जन्म के साथी होते हैं, किसी के कर्म के साथी नहीं होते। चौधरी को पुत्र से प्रगाढ प्रेम था, उन्हे शका हो गई थी कि हरनाथ रुपये