पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२१०

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२०६ मानसरोवर सुभद्रा को इस ईर्ष्या और दु ख के आवेश में अपने काम पर जाने की सुध न रही। वह कमरे में इस तरह टहलने लगी, जैसे किसी ने ज़बरदस्ती उसे बन्द कर दिया हो। कभी दोनों मुट्ठियाँ बँध जाती, कभी दांत पीसने लगती, कभी ऑठ काटतो। उन्माद की-सी दशा हो गई । आँखों में भी एक तीव्र ज्वाला चमक उठी। ज्यों-ज्यों केशव के इस निष्ठुर आघात को सोचती, उन कष्टों को याद करती, जो उसने उसके लिए मेले थे, उसका चित्त प्रतोकार के लिए विकल होता जाता था। अगर कोई बात हुई होती, आपस में कुछ मनोमालिन्य का लेश भी होता, तो उसे इतना दु ख न होता। यह तो उसे ऐसा मालूम होता था कि मानो कोई हँसते-हँसते अचानक गले पर चढ बैठे । अगर वह उनके योग्य नहीं थी, तो उन्होंने उससे विवाह ही बयों किया था ? विवाह करने के बाद भी उसे क्यों न ठुकरा दिया था ? क्यों प्रेम का वीज बोया था ? और आज जब वह बोज पल्लवों से लहराने लगा, उसकी जड़े उसके अतस्तल के एक-एक अणु में प्रविष्ट हो गई, उसका सारा रक्त, उसका सारा उत्सर्ग वृक्ष को सींचने और पालने में प्रवृत्त हो गया, तो वह आज उसे उखाड़कर फेंक देना चाहते हैं । क्या उसके हृदय के टुकड़े-टुकड़े हुए बिना वृक्ष उखड़ जायगा ? सहसा उसे एक बात याद आ गई। हिंसात्मक सतोष से उसका उत्तेजित मुख मडल और भी कठोर हो गया । केशव ने अपने पहले विवाह की वात इस युवती से गुप्त रखी होगी ! सुभद्रा इसका भडाफोड़ करके केशव के सारे मसूबों को धूल में मिला देगी। उसे अपने ऊपर क्रोध आया कि युवती का पता क्यों न पूछ लिया। उसे एक पत्र लिखकर केशव की नीचता, स्वार्थपरता और कायरता की, कलई खोल देती-उसके पाण्डित्य, प्रतिभा और प्रतिष्ठा को धूल में मिला देती। -समय तो वह कपड़े लेकर आयेगी ही। उस समय उससे सारा कच्चा चिट्ठा बयान खैर, सध्या कर दूंगी। सुभद्रा दिन-भर युवती का इन्तज़ार करती रही। कभी बरामदे में आकर इधर- उधर निगाह दौड़ाती, कभी सड़क पर देखती , पर उसका कहीं पता न था। मन में झुंझलाती थी कि उसने क्यों उसी वक्त. सारा वृत्तात न कह सुनाया। केशव का पता उसे मालूम था। उस मकान और गली का नंबर तक याद था, जहाँ से वह उसे पत्र लिखा करता था। ज्यों-ज्यों दिन ढलने लगा और युवती के