पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२१५

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सोहाग का शव २११ में आकर एक खभे की आड़ में इस भौति खड़ी हो गई कि केशव का मुंह उसके सामने था। उसकी आँखों में वह दृश्य खिच गया, जब आज से तीन साल पहले उसने इसी भाँति केशव को मडप में बैठे हुए आड़ से देखा था। तब उसका हृदय कितना उच्छवसित हो रहा था ? अतस्तल में गुदगुदी-सी हो रही था, कितना अपार अनुराग था, कितनी असीम अभिलाषाएँ थीं, मानो जीवन-प्रभात का उदय हो रहा हो । जीवन मधुर सगीत की भांति सुखद था, भविष्य उषा-स्वप्न की भाँति सुन्दर । क्या यह वहो केशव है ? सुभद्रा को ऐसा भ्रम हुआ, मानो यह केशव नहीं है। हां, यह वह केशव नहीं था । यह उसी रूप और उसी नाम का कोई दूसरा मनुष्य था । अव उसकी मुसकिराहट में, उसके नेत्रों में, उसके शब्दों मे, उसके हृदय को आक- र्षित करनेवाली कोई वस्तु न थी। उसे देखकर वह उसी भांति नि स्पद, निश्चल खड़ी है, मानो कोई अपरिचित व्यक्ति हो । अब तक केशव का-सा रूपवान्, तेजस्वी, सौम्य, शीलवान् पुरुष स सार में न था, पर अब सुभद्रा को ऐसा जान पड़ा कि वहाँ बैठे हुए युवकों में और उसमें कोई अतर नहीं है । वह ईर्ष्याग्नि, जिसमें वह जली जा रही थी, वह हिसा-कल्पना, जो उसे वहाँ तक लाई थी, मानो एकदम शान्त हो गई। विरक्ति हिंसा से भी अधिक हिंसात्मक होती है-सुभद्रा की हिंसा-कल्पना में एक प्रकार का ममत्व था-उसका केशव, उसका प्राणकलभ, उसका जीवन-सर्वस्व और किसी का नहीं हो सकता । पर अब वह ममत्व नहीं है। वह उसका नहीं है, उसे अव परवा नहीं, उस पर किसका अधिकार होता है। विवाह-सस्कार समाप्त हो गया, मित्रों ने बधाइयां दी, सहेलियों ने मगल-गान किया, फिर लोग मेज़ों पर जा बैठे, दावत होने लगी, रात के वारह बज गये, सुभद्रा वहीं पाषाण-मूर्ति की भांति खड़ी रही, मानो कोई विचित्र स्वप्न देख रही हो । हाँ, अब उसे अपने हृदय मे एक प्रकार के शून्य का अनुभव हो रहा था, जैसे कोई बस्ती उजड़ गई हो, जैसे कोई सगीत वद हो गया हो, जैसे कोई दीपक बुझ गया हो। जब लोग सदिर से निकले, तो वह भी निकल आई, पर उसे कोई मार्ग न सूझता था। परिचित सड़कें उसे भूली हुई-सी जान पड़ने लगी। सारा ससार ही बदल गया था। वह सारी रात सड़कों पर भटकती फिरो, घर का कहीं पता नहीं। सारी दूकानें बन्द हो गई, सड़कों पर सन्नाटा छा गया, फिर भी वह अपना घर . पर