पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२१७

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सोहाग का शव २१३ "हाँ, देखा ।" "वीरे से क्यों बोली ? मैंने कुछ झूठ कहा था ?" सुभद्रा ने सहृदयता से मुसकिराकर कहा -मैंने तुम्हारी आँखों से नहीं, अपनी आँखों से देखा । मुझे तो वह तुम्हारे योग्य नहीं अँचे । तुम्हें ठग लिया । युवती खिलखिलाकर हँसो और बोली-वाह ! मैं समझती हूँ, मैंने उन्हें ठगा है। सुभद्रा ने गम्भीर होकर कहा-एक बार वस्त्राभूषणों से सजकर अपनी छवि आइने में देखो, तो मालूम हो । "तव क्या मैं कुछ ओर हो जाऊँगी।" "अपने कमरे से फर्श, परदे, तमवोरें, होड़ियाँ, गमले आदि निकालकर देख लो, कमरे की शोभा वही रहती है ?" युवती ने सिर हिलाकर कहा-“ठीक कहतो हो । लेकिन आभूषण कहाँ से लाऊँ । न-जाने अभी कितने दिनों में बनने की नौबत आवे।" "मैं तुम्हें अपने गहने पहना दूंगी।" "तुम्हारे पास गहने हैं।" "बहुत । देखो, मैं अभी लाकर तुम्हें पहनाती हूँ।" युवती ने मुंह से तो बहुत नहीं-नहीं किया, पर मन में प्रसन्न हो रही थी। सुभना ने अपने सारे गहने उसे पहना दिये । अपने पास एक छल्ला भी न रखा । युवतो को यह नया अनुभव था। उसे इस रूप में निकलते शर्म तो आती थी, पर उसका रूप चमक उठा था, इसमें सन्देह न था। उसने आइने में अपनी सूरत देखी, तो उसकी आँखें जगमगा उठी, मानो किसी वियोगिनी को अपने प्रियतम का संवाद मिला हो। मन में गुइगुदी होने लगी। वह इतनी रूपवती है, उसे इसको कल्पना भी न थो। कहीं केशव इस रूप में उसे देख लेते, यह आकाक्षा उसके मन में उदय हुई, पर कहे कसे ? कुछ देर के बाद लज्जा से सिर झुकाकर बोली- "केशव मुझे इस रूप में देखकर बहुत हँसेंगे।" सुभद्रा--"हँसेंगे नहीं, बलैंया लेंगे, आँखें खुल जायेंगी। तुम आज इसी रूप में ।' उनके पास जाना ।