पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२२७

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आत्म-संगोत २२३ शीघ्र नौका खोल। जिस सुमन की यह सुगवि है, जिस दीपक की यह दोप्ति है, उस तक मुझे पहुंचा दे। मैं देख नहीं सकती, इस सगीत का रचयिता कहीं निकट ही बैठा हुआ है, बहुत निकट । मांझी- आपका महल मेरे काम का नहीं है, मेरी झोपड़ी उससे कहीं सुहा. वनी है। मनोरमा- हाय ! तो अब तुझे क्या दूं? यह सगीत नहीं है, यह इस सुवि- शाल क्षेत्र की पवित्रता है, यह समस्त सुमन-समूह का सौरभ है, समस्त मधुरताओं की माधुरी है, समस्त अवस्थाओ का सार है। नौका खोल। मैं जव तक जीऊँगी, तेरी सेवा करूँगी, तेरे लिए पानी भरूँगी, तेरी झोपडो बहारूँगी, हां, मैं तेरे मार्ग के ककड़ चुनूंगी, तेरे झोपड़े को फूलों से सजाऊँगी, तेरी माझिमन के पैर मलूंगी। प्यारे मांझी, यदि मेरे पास सौ जाने होती, तो मैं इस सगीत के लिए अर्पण करती। ईश्वर के लिए मुझे निराश न कर। मरे वैर्य का अन्तिम विंदु शुष्क हो गया। अव इस चाह में दाह है, अब यह सिर तेरे चरणों में है। यह कहते-कहते मनोरमा एक विक्षिप्त की अवस्था में मांझी के निकट जाकर उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, मानो वह सगोत आत्मा पर किसी- प्रज्वलित प्रदीप की तरह ज्योति वरसाता हुआ मेरो ओर आ रहा है। उसके रोमाच हो आया। वह मस्त होकर भूमने लगी। ऐसा ज्ञात हुआ कि मैं हवा मे उड़ी जाता हूँ। उसे अपने पार्श्व-देश में तारे झिलमिलाते हुए दिखाई देते थे। उस पर एक आत्मविस्मृति का भावावेश छा गया और तव वहो मस्ताना सगीत, वही मनोहर राग उसके मुंह से निकलने लगा। वही अमृत की वूदें, उसके अधरों से टपकने लगीं। वह स्वय इस सगीत का स्रोत थी। नदी पार से आनेवाली ध्वनियाँ, प्राणपोषिणी ध्वनियाँ उसीके मुंह से निकल रही थी। मनोरमा का मुख-मडल चन्द्रमा की तरह प्रकाशमान हो गया था, और आंखों से प्रेम की किरणे निकल रही थीं। ।