पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२२८

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ऐक्ट्रस > ( १ ) रगमच का परदा गिर गया। तारादेवी ने शकुतला का पार्ट खेलकर दर्शकों को मुग्ध कर दिया था। जिस वक्त वह शकुतला के रूप में राजा दुष्यत के सम्मुख खड़ी ग्लानि वेदना और तिरस्कार से उत्तेजित भावों को आग्नेय शब्दों में प्रकट कर रही थी, दर्शक वृद शिष्टता के नियमों की उपेक्षा करके मच की ओर उन्मत्तों की भांति दौड़ पड़े थे, और तारादेवी का यशोगान करने लगे थे। कितने ही तो स्टेज पर चढ गये और तारादेवी के चरणों पर गिर पड़े। सारा स्टेज फूलों से पट गया, आभूषणों को वर्षा होने लगी। यदि उसी क्षण मेनका का विमान नीचे आकर उसे उड़ा न ले जाता तो कदाचित् उस धक्कमधक्के में दस-पांच आदमियों की जान पर बन जाती। मैंने- जर ने तुरत आकर दर्शकों की गुण-ग्राहकता का धन्यवाद दिया और वादा किया कि दूसरे दिन फिर यही तमाशा होगा । तब लोगों का मोहोन्माद शांत हुआ। मगर एक युवक उस वक्त भी मच पर खड़ा रहा। लाँबा कद था, तेजस्वी मुद्रा, कु दन का सा देवताओ का-सा स्वरूप, गठी हुई देह, मुख से एक ज्योति-सी प्रस्पुटित हो रही थी। कोई राजकुमार मालूम होता था। जब सारे दर्शक बाहर निकल गये, तो उसने मैनेजर से पूछा - क्या मैं तारादेवी से एक क्षण के लिए मिल सकता हूँ? 'मैनेजर ने उपेक्षा के भाव से कहा- हमारे यहाँ ऐसा नियम नहीं है युवक ने फिर पूछा-क्या आप मेरा कोई पत्र उसके पास भेज सकते हैं ? मेनेजर ने उसी उपेक्षा भाव से कहा-जी नहीं। क्षमा कीजिएगा। यह भी हमारे नियमो के विरुद्ध है। युवक ने और कुछ न कहा, निराश होकर स्टेज के नीचे उतर पड़ा और बाहर जाना ही चाहता था कि मैनेजर ने पूछा- ज़रा ठहर जाइए, आपका कार्ड ? रग,