पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२३१

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1 ऐक्ट्रेस २२७ करती मैनेजर के सामने आकर खड़ी हो गई। मैनेजर ने खड़े होकर उसका स्वागत किया और बोला-मैं रात की सफलता पर आपको बधाई देता हूँ। तारा ने खड़े-खड़े पूछा-कुँवर निर्मलकान्त क्या बाहर हैं ? लड़का पत्र देकर भाग गया। में उससे कुछ पूछ न सकी। "कुँवर साहब का रुका तो रात ही तुम्हारे चले आने के बाद मिला था।" "तो आपने उसी वक्त मेरे पास क्यों न भेज दिया " मैनेजर ने दबी ज़बान से कहा-मैंने समझा, तुम आराम कर रही होगी, कष्ट देना उचित न समझा । और, भाई साफ बात यह है कि मैं डर रहा था, कहीं कुँवर साहव को तुमसे मिलाकर तुम्हे खो न वेठ् । अगर मैं औरत होता, तो उसी वक्त उनके पोछे हो लेता। ऐसा देवरप पुरुष मैने आज तक नहीं देखा । वही जो रेशमी साफा बाँधे खड़े थे तुम्हारे सामने । तुमने भी तो देखा था । तारा ने मानो अर्धनिद्रा को दशा में कहा -हाँ, देखा तो था-क्या वह फिर आयेंगे? "हाँ, आज पांच बजे शाम को । वड़े विद्वान् आदमी हैं, और इस शहर के सबसे वड़े रईस ।" "आज मैं रिहर्सल में न आऊँगी", यह कहती हुई तारा वहां से चली गई। ( ३ ) कुँवर साहब आ रहे होंगे तारा आइने के सामने बैठी है और दाई उसका झार कर रही है। शृङ्गार भी इस ज़माने में एक विद्या है। पहले परिपाटी के अनुसार ही शृङ्गार किया जाता था। कवियों, चित्रकारों और रमिकों ने शृङ्गार की मर्यादा-सी बांध दी थी । आँखों के लिए काजल लाज़मो था, हाथों के लिए मेंहदी, पांवों के लिए महावर । 'एक-एक अज एक एक आभूषण के लिए निर्दिष्ट था। आज वह परिपाटी नहीं रही। आज प्रत्येक रमणी अपनी सुरुचि, सुबुद्धि और तुलनात्मक भाव से शृङ्गार करती है ।'उसका सौंदर्य किस उपाय से आकर्षकता की सीमा पर पहुंच सकता है, यही उसका आदर्श होता है । तारा इस कला में निपुण थी । वह पन्द्रह साल से इस कम्पनी में थी और यह समस्त जीवन उसने पुरुषों के हृदय से खेलने हो में व्यतीत किया था। किस चितवन से, किस मुसकान से, किस अंगड़ाई से, किस तरह केशों को विखेर देने से दिलों का क़त्लेआम हो जाता है , इस कला में कौन उससे .