पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२६९

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ममता २६५ महरी ने चौका-बरतन करके चूल्हे में आग जला दी, उसके पीछे पड़ गई-मैं तो अपने दुखों को रो रही हूँ, इस चुडैल को रोटियों की धुन सवार है । निदान ९ बजे उससे न रहा गया । उसने यह पत्र लिखकर अपने हृदय की ज्वाला ठढी की- "सेठजी, तुम्हें अब अपने धन के घमड ने अन्धा कर दिया है, किन्तु किसी का घमण्ड इसी तरह सदा नहीं रह सकता। कभी-न-कभी सिर अवश्य नीचा होता है । अफसोस कि कल शाम को जब तुमने मेरे प्यारे पति को पकड़वाया है, मैं वहाँ मौजूद न थी, नहीं तो अपना और तुम्हारा रक्त एक कर देती। तुम यन के मद में भूले हुए हो। मैं उसी दम तुम्हारा नशा उतार देती। एक स्त्री के हाथों अपमानित होकर तुम फिर किसीको मुंह दिखाने लायक न रहते। अच्छा, इसका बदला तुम्हें किसी-न-किसी तरह ज़फर मिल जायगा। मेरा कलेजा उस दिन ठण्डा होगा, जब तुम निर्वश हो जाओगे और तुम्हारे कुल का नाम मिट नायगा।" सेठजी पर यह फटकार पड़ी तो वे क्रोध से आग हो गये। याषि क्षुद्र- हृदय के मनुप्य न थे, परतु क्रोध के आवेग में सौजन्य का चिह भी शेष नहीं रहता। यह ध्यान न रहा कि यह एक दुखिनी की क्रन्दन-ध्वनि है, एक सताई स्त्री की मानसिक दुर्बलता का विकार है। उसकी धन-हीनता और विवशता पर उन्हें तनिक भी दया न आई । वे मरे हुए को मारने का उपाय सोचने लगे। (६) इसके तीसरे दिन सेठ गिर वारीलाल पूजा के आसन पर बैठे हुए थे, महरा ने आकर कहा- सरकार कोई स्त्री आपसे मिलने आई है। सेठजी ने पूछा - कौन स्त्री है ? महरा ने कहा- सरकार, मुझे क्या मालूम, लेकिन है कोई भलेमानुस ! रेशमी साड़ी पहने हुए है । हाथ में सोने के कड़े हैं। पैरों में टाट के स्लीपर हैं। बड़े घर को त्री जान पड़ती है। यो साधारणत सेठजी पूजा के समय किसीसे नहीं मिलते थे। चाहे कैसा ही आवश्यक काम क्यों न हो, ईश्वरोपासना में सामाजिक बाधाओं को घुसने नहीं देते थे। किन्तु ऐसी दशा में जब कि बड़े घर को स्त्रो मिलने के लिए आये, तो थोड़ी देर के लिए पूजा में विलम्ब करना निन्दनीय नहीं कहा जा सकता। ऐसा विचार करके वे नौकर से बोले-~-उन्हें बुला लाओ । जब वह स्त्री आई तो सेठजी स्वागत के लिए उठकर खड़े हो गये। तत्पश्चात्