पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२६८

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२६४ मानसरोवर समारोह के साथ गार्डनपार्टी की तैयारियां की थीं। मिस्टर रामरक्षा इसके प्रबन्ध कर्ता थे। आज की 'आपटर डिनर' स्पीच उन्होंने बड़े परिश्रम से तैयार की थी; किन्तु इस वारट ने सारी कामनाओं का सत्यानाश कर दिया। यो तो वावू साह्य के मित्रों में ऐसा कोई भी न था जो दस हजार रुपये की जमानत दे देता, अदा कर देने का तो जिक्र ही क्या, किन्तु कदाचित् ऐसा होता भी तो सेठजी अपने को भाग्यहीन समझते । दस हजार रुपया और म्युनिसिपैलिटी की प्रतिष्टित मेम्बरी खोकर उन्हें इस समय यह हर्ष प्राप्त हुआ था। मिस्टर रामरक्षा के घर पर ज्योंही यह खबर पहुँची, कुहराम मच गया। उनकी स्त्री पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। जब कुछ होश में आई तो रोने लगो, और रोने से छुट्टी मिली तो उसने गिरधारीलाल को कोसना आरम्भ किया। देवी- देवता मनाने लगी। उन्हें रिश्वत देने पर तैयार हुई कि वे गिरधारीलाल को किसी प्रकार निगल जायें। इस बढे भारी काम में वह गगा और यमुना से सहायता मांग रही थी, प्लेग और विसूचिका की खुशामदें कर रही थी कि ये दोनों मिलकर इस गिरधारीलाल को हड़प ले जायँ, किन्तु गिरधारी का कोई दोष नहीं। दोष तुम्हारा है। बहुत अच्छा हुआ ! तुम इस पूजा के देवता थे। क्या उब दावतें न खिलाओगे ? मैंने तुम्हें कितना समझाया, रोई, रूठी, विगड़ी, किन्तु तुमने एक न सुनी। गिरधारी- लाल ने बहुत अच्छा किया। तुम्हें शिक्षा तो मिल गई, किन्तु तुम्हारा भी दोप नहीं यह सब आग मैंने लगाई है। मखमली स्लीपरों के बिना मेरे पाव नहीं उठते थे। बिना जड़ाऊ कड़ों के मुझे नींद न आती थी। सेजगाढ़ी मेरे ही लिए मँगवाई गई। अगरेजी पढ़ने के लिए मेम साहवा को मैंने ही रखा। ये सव कोटे मैंने हो बोये हैं। मिसेज़ रामरक्षा बहुत देर तक इन्हीं विचारों में डूबी रही। जब रात-भर कर- वटें बदलने के बाद वह सबेरे उठी, तो उसके विचार चारों ओर से ठोकरें खाकर केवल एक केन्द्र पर जम गये । गिरधारीलाल वड़ा बदमाश और घमंडी है। मेरा सय कुछ लेकर भी उसे सन्तोप नहीं हुआ। इतना भी इस निर्दयी कसाई से न देखा गया । भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों ने मिलकर एक रूप धारण किया और क्रोधाग्नि . को दहकाकर प्रबल कर दिया । ज्वालामुखी शीशे में जब सूर्य की किरणे एक होती है, तव अग्नि प्रक्ट हो जाती है । इस स्त्री के हृदय में रह-रहकर क्रोध की एक असाधारण लहर उत्पन्न होती थी। बच्चे ने मिठाई के लिए हठ किया, इमपर घरस पदी। .