पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२७७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मन्त्र कर दिखाया भी था। प्राणि-शास्त्र के बड़े-बड़े पण्डित भी यह व्याख्यान सुनकर दग रह गये थे। यह विद्या उसने एक बूढे सपेरे से सीखी थी। सांपों की जड़ी-बूटियाँ जमा करने का उसे मरज़ था। इतना पता भर मिल जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छो जड़ी है, फिर उसे चैन न आता था। उसे लेकर ही छोड़ता था। यही व्यसन था । इस पर हज़ारो रुपये फूक चुका था। मृणालिनी कई वार आ चुकी थी। पर कभी सांपों के देखने के लिए इतनी उत्सुक न हुई थो। कह नहीं सकते, आज उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गई थी या वह कैलास पर अपने अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी, पर उसका आग्रह बेमौका था। उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जायगी, भोड़ को देखकर सांप कितने चौंकेंगे और रात के समय उन्हे छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे ज़रा भी ध्यान न आया । कैलास ने कहा - नहीं, कल ज़रूर दिखा दूंगा। इस वक्त अच्छी तरह दिखा भी तो न सकूँगा, कमरे में तिल रखने की जगह भी न मिलेगी। एक महाशय ने छेड़कर कहा-दिखा क्यों नहीं देते जी, जरा-सी वात के लिए इतना टालमटोल कर रहे हो। मिस गोविन्द, हगिज न मानना। देखें, कैसे नहीं दिखाते ! दूसरे महाशय ने और रद्दा चहाया-मिस गोविन्द इतनी सीधी और भोली हैं, तभी आप इतना मिज़ाज करते हैं। दूसरी सुन्दरी होतो, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती। तीसरे साहब ने मज़ाक उड़ाया-अजी, कोलना छोड़ देती । भला कोई बात है। इस पर आपको दावा है कि मृणालिनी के लिए जान हाज़िर है मृणालिनी ने देखा कि ये शोहदे उसे चग पर चढ़ा रहे हैं, तो बोली - आप लोग मेरी वकालत न करें, मैं खुद अपनी वकालत कर लूंगी। में इस वक्त साँपो का तमाशा नहीं देखना चाहती । चलो, छुट्टी हुई। इस पर मित्रों ने ठट्ठा लगाया। एक साहब बोले-देखना तो आप राय कुछ चाहें, पर कोई दिखाये भी तो ? कैलास को मृणालिनी को मेंपो हुई सूरत देखकर मालूम हुआ कि इस वक्त उसका इनकार वास्तव में उसे बुरा लगा है। ज्याही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुद्ध हुआ, उसने मृणालिनी और अय मित्रों को साँपो के दरजे के सामने ले १८