पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२८१

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२७७ (३) शहर से कई मील दूर एक छोटे से घर में एक बूढ़ा और एक बुढ़िया अँगीठो के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे । बूढा नारियल पीता था, और बीच-बीच में खाँसता था। बुढिया दोनों घुटनियों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी। एक मिट्टी के तेल की कुप्पी ताक पर जल रही थी। घर में न चारपाई थी, न विछौना । एक किनारे थोड़ी-सो पुआल पड़ी हुई थी। इसी कोठरी में एक चूल्हा था। बुढ़िया दिन-भर उपले और सूखी लकड़ियां बटोरतो थी। बूढा रस्सी वटकर बाजार में बेच लाता था। यही उनकी जीविका थी। उन्हें न किसीने रोते देखा, न हँसते । उनका सारा समय जीवित रहने में कट जाता था। मौत द्वार पर खड़ी थी. रोने या हँसने की कहाँ फुर्सत । बुढ़िया ने पूछा-कल के लिए सन तो है ही नहीं, काम क्या करोगे? 'जाकर झगडू साह से दस सेर सन उधार लाऊँगा।' 'उसके पहले के पैसे तो दिये ही नहीं, और उधार कैसे देगा ?' 'न देगा न सही। घास तो कहीं नहीं गई है। दोपहर तक क्या दो आने को भी न काहूँगा? इतने में एक आदमी ने द्वार पर आवाज़ दी-भगत, भगत, क्या सो गये ? ज़रा किवाड़ खोलो। भगत ने उठकर किवाड़ खोल दिये। एक आदमी ने अन्दर आकर कहा-कुछ सुना, डाक्टर चड्ढा बावू के लड़के को साँप ने काट लिया। भगत ने चौंककर कहा-चड्ढा वावू के लड़के को ! वही चढ्ढा बाबू हैं न, जो छावनी में बँगले रहते है ? 'हाँ-हाँ वही । शहर में हल्ला मचा हुआ है। जाते हो तो जाओ, आदमी बन जाओगे?' बूढे ने कठोर भाव से सिर हिलाकर कहा-मैं नहीं जाता। मेरी बला जाय । चहो चड्ढा है । खूब जानता हूँ। भैया को लेकर उन्हींके पास गया था। खेलने जा रहे थे। पैरों पर गिर पड़ा कि एक नज़र देख लीजिए ; मगर सीधे मुँह'वात तक न की। भगवान् बैठे सुन रहे थे। अब जान पड़ेगा कि बेटे का गम कैसा होता है। कई लड़के हैं ? 2