पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२८२

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२७८ मानसरोवर i 'नहीं जी, यही तो एक लड़का था। सुना है, सबने जवाब दे दिया है।' 'भगवान् बड़ा कारसाज है। उस बखत मेरी आँखों से आंसू निकल पड़े थे पर उन्हें तनिक भी दया न आई थी। मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी वात न पूछता 'तो न जाओगे ? हमने जो सुना था सो कह दिया ।' 'अच्छा किया- अच्छा किया । कलेजा ठण्डा हो गया, आँखें ठण्डी हो गई । लड़का भो ठण्डा हो गया होगा। तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊँगा। ( बुढिया से ) जरा तमाखू ले ले । एक चिलम और पीऊँगा । अब मालूम होगा लाला को ! सारो साहिवी निकल जायगी, हमारा क्या बिगड़ा'। लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया है जहाँ छ वच्चे गये थे, वहाँ एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सूना हो जायगा । उसी के वास्ते सबका गला, दवा-दवाकर जोड़ा था न ! अब क्या करोगे ? एक बार देखने जाऊँगा; पर कुछ दिन बाद। मिजाज का हाल पूढूंगा।' आदमी चला गया। भगत ने किवाड़ बन्द कर लिये, तब चिलम पर तमाखू रखकर पीने लगा। बुढ़िया ने कहा-इतनी रात गए जाड़े-पाले मे कौन जायगा ? 'अरे, दोपहर ही होता, तो मैं न जाता । सवारी दरवाजे पर लेने आती, तो भी जानता। भूल नहीं गया हूँ। पन्ना की सूरत आज भी आँखों में फिर रही है । इस निर्दयो ने उसे एक नजर देखा तक नहीं । 'क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा ? खूव जानता था । चड्ढा भगवान् नहीं थे कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी। जरा तसल्ली हो जाती । बस, इसीलिए उनके पास दौड़ा गया था। अब किसी दिन जाऊँगा और कहूँगा- क्यों साहब, कहिए, क्या रग हैं ? दुनिया बुरा कहेगी, कहे , कोई परवाह नहीं। छोटे आदमियो में तो सब ऐव होते ही हैं । बड़ों में कोई ऐब नहीं होता । देवता होते हैं।' भगत के लिए जीवन में यह पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पाकर वह बैठा रह गया हो। ८० वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ कि साँप की खबर पाकर वह दौड़ा न गया हो। माघ-पूस की अँधेरी रात, चैत-वैसाख की धूप और लू , सावन- भादों की चढी हुई नदी ओर नाले, किसीकी उसने कभी परवाह न की। वह तुरन्त